नहरवार पैक्स प्रबंधक की नियुक्ति को विभाग ने माना अवैध

नहरवार पैक्स प्रबंधक की नियुक्ति को विभाग ने माना अवैध
पूर्व प्रबंधक हिमांशु को प्रभार दिए जाने का मिला निर्देश महिषी. क्षेत्र के नहरवार पैक्स अध्यक्ष के द्वारा पूर्व प्रबंधक नहरवार निवासी शांति मुखिया के पुत्र हिमांशु कुमार को अवैध रूप से पदमुक्त कर वर्ष 2019 में नव चयनित पैक्स अध्यक्ष रघुवंश नारायण सिंह के द्वारा प्रिंस कुमार व फिर वर्ष 2024 में पैक्स अध्यक्ष अरुण मुखिया ने प्रिंस को पदमुक्त कर अपने सगे भाई श्रवण कुमार की प्रतिनियुक्ति को न्यायालय वाद में अवैध माना गया है. बता दें कि अवैध नियुक्ति के खिलाफ हिमांशु ने न्यायालय निबंधक, सहयोग समितियां बिहार पटना में वर्ष 2020 में वाद प्रतिवेदन दर्ज कराते वैधानिक पहल की मांग की थी. सुनवाई के दौरान न्यायालय ने विभागीय जांच का आदेश निर्गत कर प्रतिवेदन मांगा गया. संयुक्त निबंधक कोसी प्रमंडल के आदेश के आलोक में सहरसा अंचल के सहायक निबंधक विष्णुदेव सिंह ने तीन जुलाई 2025 को सभी प्रतिवादी प्रिंस कुमार, हिमांशु कुमार व नव चयनित प्रबंधक श्रवण कुमार की उपस्थिति में जांच की गयी. जांच में पाया गया कि हिमांशु कुमार पैक्स अध्यक्ष के पद पर पूर्व से कार्यरत रहे हैं. जांच में दोनों की प्रतिनियुक्ति संबंधी ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं कराया गया. कार्यरत प्रबंधक को हटाने व नया प्रबंधक नियुक्त किये जाने के संदर्भ में विभागीय पत्रांक व मंत्री सहकारिता विभाग डॉ प्रेम कुमार के पीत पत्र के द्वारा पैक्स कार्मिकों के आदर्श सेवा नियमावली नीति के विरुद्ध हटाए गये पैक्स प्रबंधक के निर्गत आदेश को निरस्त करने संबंधी निर्देश जारी हुआ है. जांच प्रतिवेदन में श्री सिंह ने स्पष्ट रूप से कहा है कि हिमांशु कुमार का निलंबन कर प्रिंस कुमार का सहायक प्रबंधक पर चयन व फिर प्रिंस को हटा श्रवण कुमार को प्रबंधक के पद पर नियुक्ति वैध नहीं है. जांच प्रतिवेदन की प्राप्ति के बाद न्यायालय आदेश के आलोक में कोसी प्रमंडल के संयुक्त निबंधक निसार अहमद ने जिला सहकारिता पदाधिकारी को पत्र दे पूर्व प्रबंधक हिमांशु कुमार को पैक्स प्रबंधक के रूप में कार्यभार अंतरण कराने का निर्देश दिया है. डीसीओ के निर्देश पर सहायक निबंधक ने वर्तमान पैक्स अध्यक्ष अरुण कुमार को तत्काल प्रभाव से हिमांशु को पैक्स का संपूर्ण प्रभार देने संबंधी पत्र प्रेषित किया है. हिमांशु ने बताया कि विभागीय आदेश व न्यायालय वाद के फैसला के बाद भी उसे प्रभार नहीं दिया जा रहा है.
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