अब इतिहास हो रहा दफन

Published at :03 Mar 2017 4:10 AM (IST)
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अब इतिहास हो रहा दफन

धरोहर संरक्षण. आस्था के नाम पर हो रहा है अतिक्रमण ब्रिटिश से लेकर स्वतंत्र भारत तक के कैदी रहते थे इस जेल में पुरानी जेल को संरक्षित करने में उदासीन है जिला प्रशासन सहरसा : शहर के मध्य वार्ड नंबर 20 स्थित पुरानी जेल प्रशासनिक उदासीनता की वजह से दिन-ब-दिन अतिक्रमण का शिकार होती जा […]

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धरोहर संरक्षण. आस्था के नाम पर हो रहा है अतिक्रमण

ब्रिटिश से लेकर स्वतंत्र भारत तक के कैदी रहते थे इस जेल में
पुरानी जेल को संरक्षित करने में उदासीन है जिला प्रशासन
सहरसा : शहर के मध्य वार्ड नंबर 20 स्थित पुरानी जेल प्रशासनिक उदासीनता की वजह से दिन-ब-दिन अतिक्रमण का शिकार होती जा रही है. खंडहर में तब्दील हो रहे पुरानी जेल के साथ ही ब्रिटिश हुकूमत से लेकर स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी कई यादें भी दफन हो रही है. पुरानी जेल को संरक्षित करने के बजाय अतिक्रमणकारियों के हवाले छोड़ दिया गया है. वर्ष 1942 के स्वतंत्रता आंदोलन में तत्कालीन भागलपुर जिला का राजस्व प्रक्षेत्र सहरसा, सुपौल व मधेपुरा क्षेत्र के स्वतंत्रता सेनानी को कारावास की सजा देने के लिए उप कारा के रूप में पुरानी जेल की स्थापना की गयी थी. ज्ञात हो कि देश को आजादी मिलने के बाद भी
मंडल कारा सहरसा के स्थापना से पूर्व तक वर्ष 1960 तक पुरानी जेल में ही बंदियों को रखा जाता था. इस दौरान एडीएम व डीएम कोर्ट का संचालन भी पुरानी जेल में ही किया जाता था. बाद में वर्ष 1960 में समाहरणालय निर्माण के बाद डीएम कोर्ट भी यहां से स्थांतरित हो गया. लोग कहते हैं कि जिन दीवारों के अंदर कई ऐतिहासिक फैसले व स्वत्रंता सेनानियों के किस्से दर्ज हैं, वहां अब मंदिर के नाम पर इतिहास से छेड़छाड़ की जा रही है.
1968 से 1977 तक सिविल कोर्ट
पुरानी जेल के सरकारी भवन का उपयोग 1968 से 1977 तक सिविल कोर्ट के रुप में हुआ. इस दौरान जिले के सभी मामलों के निबटारा की व्यवस्था व्यवहार न्यायालय पुरानी जेल में ही होता था. इस दौरान जेल परिसर में ही जिला जज का आवास भी हुआ करता था. इसके अलावा जिले के अति महत्वपूर्ण क्षेत्र में शामिल पुरानी जेल में बने सरकारी क्वार्टर में ही सदर एसडीएम सहित विभागों के वरीय अधिकारी भी रहते थे.
1977 से संचालित हो रहा सर्वे कार्यालय: वर्तमान में पुरानी जेल को लोग सर्वे कार्यालय के रुप में जानते हैं. जमीन संबंधी रेकर्ड व अन्य जानकारी के लिए सहरसा सहित सुपौल व मधेपुरा के लोग पहुंचते हैं. हालांकि पुरानी जेल का लगातार हो रहे अतिक्रमण की वजह से कार्यालय का प्रक्षेत्र सिकुड़ता जा रहा है. जानकार बताते हैं कि आठ एकड़ से अधिक भूमि पुरानी जेल के नाम पर आवंटित है. जेल स्थांतरण के बाद भी मंडल कारा को पुरानी जेल के देखभाल का जिम्मा दिया गया था. ज्ञात हो कि पांच वर्ष पूर्व राज्य सरकार के प्रतिनिधि मंडल द्वारा पुरानी जेल को बाल बंदियों को रखने के लिए रिमांड होम में तब्दील करने की बात कही गयी थी. लेकिन इस दिशा में भी कोई कवायद नहीं की गयी.
मंदिर के नाम पर हो रहा अतिक्रमण
पुरानी जेल में पूर्व से हनुमान जी की एक प्रतिमा स्थापित थी. लेकिन विगत वर्षों में भू माफियाओं द्वारा पुरानी जेल के परिसर का अतिक्रमण कर देवी-देवताओं का मंदिर बनाया जाने लगा. धीरे-धीरे ऐतिहासिक परिसर को चारों तरफ से मंदिर निर्माण कर घेराबंदी कर ली गयी. हालांकि जिला प्रशासन को लगातार हो रहे अतिक्रमण की जानकारी भी दी गयी. लेकिन प्रशासनिक स्तर से कोई कार्रवाई नहीं की गयी. स्थानीय लोग बताते हैं कि जिला प्रशासन की स्वीकृति के बगैर अवैध तरीके से एक कमेटी गठित कर मंदिर का संचालन भी किया जा रहा है.
अब तो मार्केट बना वसूल रहे किराया
मंदिर के नाम पर अतिक्रमण करने के बाद भी प्रशासनिक सुस्ती को देख अतिक्रमणकारियों का हौसला बढ़ता गया. इन दिनों मंदिर परिसर में सड़क किनारे अवैध रुप से दर्जन भर पक्का दुकानों का निर्माण कर किराये पर भी दे दिया गया है. कमेटी से जुड़े लोग बताते हैं कि दुकान के किराये से मंदिर का विकास कार्य किया जाता है. इसके अलावा विगत तीन वर्षो से मंदिर परिसर में दुर्गा पूजा मेला का भी आयोजन किया जाने लगा है.
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