अंतिम सोमवारी पर लाखों कांवरिया करेंगे जलार्पण

Published at :15 Aug 2016 6:14 AM (IST)
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अंतिम सोमवारी पर लाखों कांवरिया करेंगे जलार्पण

दुनिया का अद्भुत शिवलिंग है मटेश्वर धाम में निरंजन/सिमरी बख्तियारपुर : कोसी क्षेत्र के बाबाधाम के रूप में प्रसिद्ध बाबा मटेश्वर धाम की महिमा अपार है. सावन के अंतिम सोमवारी को लाखों कांवरिया शिवलिंग पर जलाभिषेक करेंगे. कांवरियों का जत्था रविवार अहले सुबह से ही मुंगेर के छर्रापट्टी घाट जा रहा है. जिला मुख्यालय से […]

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दुनिया का अद्भुत शिवलिंग है मटेश्वर धाम में

निरंजन/सिमरी बख्तियारपुर : कोसी क्षेत्र के बाबाधाम के रूप में प्रसिद्ध बाबा मटेश्वर धाम की महिमा अपार है. सावन के अंतिम सोमवारी को लाखों कांवरिया शिवलिंग पर जलाभिषेक करेंगे. कांवरियों का जत्था रविवार अहले सुबह से ही मुंगेर के छर्रापट्टी घाट जा रहा है. जिला मुख्यालय से 15 किलोमीटर एवं सिमरी बख्तियारपुर रेलवे स्टेशन से 10 किलोमीटर की दूरी पर काठो स्थित मटेश्वरधाम में उमड़ रही भीड़ के कारण यह छोटा-सा गांव आस्था का प्रमुख केंद्र बनता जा रहा है.
स्वयं अंकुरित है शिवलिंग: मटेश्वरधाम का अनोखा शिवलिंग स्वयं अंकुरित है. यह शिवलिंग 14 वीं शताब्दी का बताया जाता है. समतल जमीन से 30-40 फीट उंचे टीले पर स्थापित काले पत्थर के शिवलिंग की मोटाई करीब ढ़ाई फीट व ऊंचाई चार फीट है. शिवलिंग के चारों तरफ एक इंच की चौड़ाई में खाली स्थान है. गरमी के मौसम में खाली स्थान पानी से लबालब भरा रहता है. जबकि बरसात में इसका जलस्तर काफी नीचे चला जाता है.
वर्ष 2003 में शंकराचार्य वासुदेवानंद सरस्वती ने इस शिवलिंग का दर्शन कर कहा था कि ऐसा अद्भुत शिवलिंग मैंने पहली बार देखा है. यह दुनिया का अनोखा शिवलिंग है. बताया जाता है कि यह मंदिर पत्थर से निर्मित था. लेकिन औरंगजेब के शासन काल में इसे तोड़ दिया गया था. अभी भी मंदिर का अवशेष प्रांगण में पड़ा हुआ है.
मंदिर का नये सिरे से हुआ निर्माण: कहते हैं करीब सौ साल पहले बघवा गांव के सत्यदेव राय को भगवान शिव स्वप्न में आये थे. उसके बाद उन्होंने मंदिर का निर्माण कराया. मंदिर परिसर के चारों तरफ समय-समय पर खुदाई की गयी तो पुरानी मूर्तियां, पत्थर एवं अन्य निर्मित सामान मिले थे. वर्तमान में मटेश्वर धाम के चारों तरफ करीब 22 एकड़ जमीन है. मंदिर के ठीक सामने सौ मीटर की दूरी पर पोखर है. इसकी खुदाई करने के क्रम में नौ कुएं मिले थे. कहा जाता है कि एक मूक साधु मुशहरू दास मंदिर के दक्षिण दिशा में खुदाई करने के लिए हमेशा इशारे से प्रेरित किया करते थे.
जब ग्रामीणों द्वारा खुदाई की गयी, तो एक से एक पत्थर एवं बहुमूल्य मूर्तियां मिलती चली गयीं. वर्ष 2007 में पुरातत्व विभाग के निदेशक डॉ फनीकांत मिश्र ने भी मटेश्वरधाम का भ्रमण करने के क्रम में मंदिर परिसर की खुदाई से निकले सामान देख आश्चर्य व्यक्त किया था. उन्होंने मंदिर में स्थित भगवान शनि की मूर्ति को भारत की दूसरी मूर्ति बता कर मटेश्वरधाम को सेटेलाईट के माध्यम से भारत के मानचित्र पर लाने का आश्वासन दिया था.
मुन्ना ने शुरू की परंपरा : शिव पुराण में बाबा मटेश्वर का नाम मृत्येश्वर के नाम से वर्णित है जो सृष्टि में एक है. ग्रामीण लोग पहले इसे बुढ़वामठ कहा करते थे. काठो निवासी मुन्ना भगत ने किशोरावस्था में ही वर्ष 1997 में अपने मित्रों शिवेन्द्र पोद्दार, सिकेन्द्र साह, संजय चौरसिया, मंगल साह, सत्यनारायण साह, विनोद सिंह, अशोक यादव, अशोक साह, पिताम्बर, हरेराम सिंह, बीरबल साह को प्रेरित कर अपनी व्यवस्था से पहली बार कावंरिया बम की शुरूआत की. मटेश्वर धाम से 80 किलोमीटर दूर मुंगेर घाट, छर्रापट्टी गंगा नदी से जल भर कर खगड़िया, मानसी, बलहाबाजार, बदला घाट,
कात्यायनी स्थान, धमारा घाट, कोपरिया स्टेशन तक रेल पटरी के किनारे पत्थरनुमा पगडंडी पर कष्टदायक यात्रा कर सिमरी बख्तियारपुर के रास्ते मटेश्वरधाम पहुंच कर अद्भुत शिवलिंग पर जलाभिषेक एवं पूजा अर्चना कर इतिहास रच दिया. उसके बाद से ही यहां कांवर चढ़ाने की परंपरा बन गयी.
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