कौन कहता है कि बिहार गरीब राज्य है...

Published at :30 Oct 2015 6:33 PM (IST)
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कौन कहता है कि बिहार गरीब राज्य है...

कौन कहता है कि बिहार गरीब राज्य है… फटफटिया से लेकर एक्सयूवी तक की लगी रहती है फेहरिश्तजगह-जगह चलता है भंडारा, पेट भर खाना खा रहे हैं लोगकुमार आशीष/ सहरसा नगरकौन कहता है कि बिहार बीमारू राज्य और बिहारी गरीब हैं? संदेह हो तो किसी भी चुनावी क्षेत्रों में घुम कर देख लीजिए. यहां पैसे […]

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कौन कहता है कि बिहार गरीब राज्य है… फटफटिया से लेकर एक्सयूवी तक की लगी रहती है फेहरिश्तजगह-जगह चलता है भंडारा, पेट भर खाना खा रहे हैं लोगकुमार आशीष/ सहरसा नगरकौन कहता है कि बिहार बीमारू राज्य और बिहारी गरीब हैं? संदेह हो तो किसी भी चुनावी क्षेत्रों में घुम कर देख लीजिए. यहां पैसे पानी की तरह बहाए जा रहे हैं. जैसे, इसका कोई मोल ही नहीं. यह सब देख लगता है कि बिहार अमीर प्रांतों की श्रेणी में शामिल हो गया है. यहां किसी सुख-सुविधा का अभाव नहीं रह गया है. प्रत्याशियों के दरवाजे से रोज फटफटिया से लेकर अतिआधुनिक एक्सयूवी जैसी गाड़ियां तक खुल रही है. टैंक फुल कराने के बाद विभिन्न दिशाओं में निकलने के बाद गाड़ियां वापस रात को ही लौटती है. गांवों की चमचमाती सड़कों पर सरसराती गाड़ियों के पहुंचते ही पहले इन्हें देखने वालों की भीड़ लगती है. बाद में प्रत्याशियों या उनके प्रतिनिधियों से रूबरू होते हैं. इन गाड़ियों पर सफेदपोश सवार होते हैं. लिहाजा उनकी जेबों में हरियाली ही हरियाली रहती है. निर्दलीय प्रत्याशी ही क्यों न हों, जरा उन्हीं के काफिले को गौर कर लें. कम से कम पांच गाड़ियां तो साथ-साथ चलती ही हैं. पार्टीगत हुए तो यह संख्या गुणात्मक रूप से बढ़ जाती है. चुनाव प्रचार के लिए रिक्शा, टैंपो, ट्रेकर व बोलेरो जैसे दर्जनों वाहन भी पौ फटते ही स्पीकर बजाते निकल पड़ते हैं. पार्टी ऑफिस में दाल सस्ती हैभले ही पूरे देश में दाल की बढ़ी कीमत से त्राहिमाम मची हो. अरहर की दाल लोगों की रसोई और थाली से गायब हो गयी हो. लोग अरहर की जगह चने से लेकर खेसारी की दाल पर उतर आये हों. लेकिन पार्टी प्रत्याशियों के लिए 180 रुपये प्रति किलो वाली यह दाल अभी भी बहुत सस्ती है. बाजार से बोरा का बोरा इनके भंडार में जा रहा है. चुनाव के दौरान प्रत्याशियों के घर पर 24 घंटे अनवरत चल रहे भंडारे में दाल की महक व खूब स्वाद मिल रहा है. आसपास सहित स्वयं को प्रत्याशी समर्थक बताने वाले लोगों के दो शाम का भोजन यहीं हो रहा है. वे खूब जयकारा लगा रहे हैं. पोस्टर, पंपलेट भी बता रहा स्टेटसचुनाव में पार्टी से टिकट पाए या निर्दलीय प्रत्याशी बने लोगों का स्टेटस उनका पोस्टर, पंपलेट, स्टीकर, बैनर, होर्डिंग भी तय कर रहा है. आधुनिकता की ओर ढ़ल चुके सब के सब उम्मीदवार इस बार लिथो, स्क्रीन या टू कलर ऑफसेट प्रिंट से दूर हो मल्टीकलर प्रिंट की ओर जा चुके हैं. इन दिनों प्रिंटिंग प्रेस भी उम्मीदवारों के अलावे किसी दूसरे का काम नहीं कर रहा है. अब जब आखिरी चरण के चुनाव में पांच दिन शेष बचे हैं. फिर भी प्रत्याशियों के लिए रोज कुछ न कुछ छप कर उनके कार्यालय पहुंच ही रहा है. रातों-रात वितरण कराया जा रहा है. अभी मतदाता परची के साथ प्रत्याशी के रंग-बिरंगे तसवीर वाली हैंडबिल लोगों के घर-घर पहुंचाया जा रहा है. लेकिन वोटर उन्हें ले मुस्कुरा भर रहे हैं.

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