ठंडे की खरीदारी से मूड गरम

Published at :25 May 2014 3:15 AM (IST)
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ठंडे की खरीदारी से मूड गरम

डेहरी कार्यालय : तपिश बढ़ने से कई चीजों की मांग बढ़ गयी है. इसमें शीतल पेय पदार्थ अहम है. लेकिन, बाजारों में उपलब्ध ठंडे पेय पदार्थो की खरीद मूड को गरम कर दे रही है. कारण भी वाजिब है. अब कोल्ड ड्रिंक खरीदने जायें और दुकानदार उस उत्पाद को ठंडा करने का अलग से चार्ज […]

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डेहरी कार्यालय : तपिश बढ़ने से कई चीजों की मांग बढ़ गयी है. इसमें शीतल पेय पदार्थ अहम है. लेकिन, बाजारों में उपलब्ध ठंडे पेय पदार्थो की खरीद मूड को गरम कर दे रही है. कारण भी वाजिब है. अब कोल्ड ड्रिंक खरीदने जायें और दुकानदार उस उत्पाद को ठंडा करने का अलग से चार्ज मांगे, तो मूड गरम होगा ही. मामला यह है कि बाजारों में देसी से लेकर विदेशी ब्रांड तक के पेय पदार्थ उपलब्ध हैं.

जिन्हें ठंडा करके ही बेचा जाना होता है. लेकिन, हद तो तब हो जाती है, जब दुकानवाले उस उत्पाद के मूल्य के अतिरिक्त ठंडा करने का अलग से पैसा मांगे. जाहिर सी बात है, इस पर लोगों को गुस्सा तो आयेगा. मूड भी गरम होगा. दुकानदार स्पष्ट कह रहे हैं कि ठंडा करायी कौन देगा. हालात यह है कि ब्रांडेड कंपनियों के प्रोडक्ट 12 से 40 प्रतिशत अधिक मूल्य पर बाजारों में बिक रहे हैं. और ग्राहक बेचारे भी क्या करें, प्यास तो बुझानी ही है, कौन झिक-झिक करे. यही सोच कर वह दुकानदार जितने पैसे मांगते हैं, वे दे देते हैं.

12 से 40 प्रतिशत अधिक दाम पर मिल रहे प्रोडक्ट : बाजार में जिस बोतल की कीमत 10 रुपये है, वह 13 से 14 में मिल रहा है. बड़ी बोतल, जिसकी एमआरपी 75 रुपये है, उसे 85 रुपये में बेचा जा रहा है. अगर, हिसाब लगाया जाये, तो छोटी बोतल का लगभग 30 से 40 प्रतिशत और बड़ी बोतल का लगभग 12 प्रतिशत अधिक मूल्य दुकानदार लोगों से वसूल रहे हैं.

कंपनियों की पकड़ से बाहर हैं दुकानदार : ब्रांडेड कंपनियां सिर्फ प्रोडक्ट बेचने तक की जिम्मेवारी लेती हैं. वह प्रोडक्ट ब्लैक हो रहा है, इसकी जवाबदेही उनकी नहीं. शहर मे कोका कोला के डीलर वीके इंटरप्राइजेज के बृजेश कुमार तिवारी ने कहा कि कंपनी के सेल्स के लोग बाजार में घूमते हैं. एमआरपी से अधिक मूल्य नहीं लेना है. ठंडा करने के लिए ही दुकानदारों को एमआरपी से कम दर पर प्रोडक्ट दिया जाता है. कोई एमआरपी से अधिक मूल्य मांगता है, तो वह गलत है.

अफसर जवाबदेही को तैयार नहीं : पेय पदार्थ के ब्लैक की बात चली, तो पहले जिला आपूर्ति पदाधिकारी अविनाश कुमार से पूछा गया. उन्होंने स्पष्ट कहा कि आपूर्ति विभाग मूल्य नियंत्रण पर कार्य नहीं करता. यह कार्य फूड इंस्पेक्टर का है. फूड इंस्पेक्टर को ढूंढने के लिए सिविल सजर्न डॉ राम जी प्रसाद से पूछा गया, तो उन्होंने कहा करीब ढाई साल हो गये. सिर्फ एक बार फूड इंस्पेक्टर नारायण राम का दर्शन हुआ है. उन्होंने जो नंबर दिये, वो भी किसी काम का नहीं.

प्रभारी जिलाधिकारी सह उपविकास आयुक्त रामचंद्रू डू से भी उनके मोबाइल पर बात नहीं हो सकी. ऑफिस के लैंडलाइन पर जवाब मिला साहब मीटिंग कर रहे हैं. सवाल उठता है कि आम उपभोक्ता का खुलेआम आर्थिक शोषण हो रहा है और न कंपनी, न डीलर और न अफसर कोई जवाबदेही लेने को तैयार हैं. ऐसे में आम उपभोक्ताओं को सजग होना होगा.

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