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आस्था का केंद्र है विवेकानंद पल्ली काली स्थान

Updated at : 11 Oct 2025 5:10 PM (IST)
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आस्था का केंद्र है विवेकानंद पल्ली काली स्थान

पूर्णिया

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पूर्णिया. रजनी चौक से पूरब विवेकानंद पल्ली में होने वाली काली पूजा का इतिहास 66 वर्ष पुराना है. मां काली का यह पूजन स्थल अजीब आस्था का केन्द्र है. इस मुहल्ले में रहने वाले लोग कोई भी नया और शुभ काम शुरु करने से पहले मां काली की पूजा कर आशीर्वाद लेते हैं. यह परम्परा जमाने से चली आ रही है. खास तौर पर काली पूजा के समय यहां श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है जिसमें पूरे शहर के लोग शामिल होते हैं. दशहरा के बाद से ही यहां काली पूजा की तैयारी चल रही है.

मंदिर का इतिहास

शहर की विवेकानंद कालोनी सन् 1959 में आबाद हुई थी. इस समय यहां कुल 64 लोगों ने एक साथ रहने के लिए जमीन खरीदी थी और जमीन मालिक से काली स्थान के लिए चार कट्ठा जमीन दान में देने का आग्रह किया था. स्थानीय लोग बताते हैं कि जमीन मालिक ने यह जमीन दान में दी और उसके बाद से ही यहां पूजा शुरु हो गयी. कहते हैं कि मंदिर के निर्माण में स्व. संतोष विश्वास, स्व. धीरेन्द्र दे, स्व. विन्ध्य दे, स्व. उपेन्द्र प्रसाद आदि का काफी योगदान रहा.

बंग्ला संस्कृति की झलक

विवेकानंद पल्ली की काली पूजा में बंग्ला संस्कृति की झलक मिलती है. स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि पहले मुहल्ले एवं आस पास रहने वाले लोग बंग्ला संस्कृति से जुड़े थे. आज भी इस संस्कृति का प्रभाव बना हुआ है और लोग इसे मानते भी हैं. लोगों का कहना है कि प्रतिमा जब भी आयी, यहां श्रद्धालुओं का हमेशा देवी के भव्य रुप का दर्शन हुआ है और सबकी इसमें काफी आस्था है.

प्रतिभाओं को मिलता है सम्मान

विवेकानंद पल्ली काली पूजा के दौरान बच्चों के अंदर छिपी हुई हर क्षेत्र की प्रतिभाओं को सम्मान दिया जाता है और यही यहां की विशेषता है. आयोजन समिति के सदस्य बताते हैं कि 12 वर्ष तक के बच्चों की फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता और 14 वर्ष तक के बच्चों की नृत्य प्रतियोगिता के साथ-साथ आरती, गजल,आर्ट और धीमी गति सायकिल रेस प्रतियोगिताएं करायी जाती हैं. इस बहाने बच्चों की प्रतिभा उभारी जाती है.

आकर्षक सज्जा और भीड़

काली पूजा के दौरान आकर्षक सज्जा में भी यह पूजा समिति आगे रहती है. बड़े-बड़ पंडाल बनवाए जाते हैं और उसे बिजली की झिलमिलाते बल्बों से सजाया जाता है जो देखने में काफी आकर्षक लगता है. इसके साथ ही यहां भक्तों की भीड़ भी खूब जुटती है. खास कर पूजा के समय रात्रि 12 बजे पूरा पूजा पंडाल खचाखच भरा रहता है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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ARUN KUMAR

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By ARUN KUMAR

ARUN KUMAR is a contributor at Prabhat Khabar.

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