पूर्णिया के रक्तवीर दो साल की उम्र में बच्ची को लिया गोद, 12वें साल भी दे रहे जिंदगी
Published by : AKHILESH CHANDRA Updated At : 13 Jun 2026 6:14 PM
पूर्णिया. साहित्य और राजनीति के लिए प्रसिद्ध पूर्णिया की धरती पर रक्तवीरों की प्रेरणादायक मिसाल देखने को मिलती है, जहां कई स्वयंसेवी लोग थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों की लगातार मदद कर रहे हैं. वर्ष 2016 से शुरू हुई यह पहल आज भी जारी है, जिसमें एक बच्ची को नियमित रक्तदान के माध्यम से जीवनदान दिया जा रहा है. श्रीराम सेवा संघ और सोशल टीम पूर्णिया जैसी संस्थाएं इस सेवा कार्य में लगातार सक्रिय हैं और जरूरतमंद मरीजों को समय पर रक्त उपलब्ध कराकर मानवता की मिसाल पेश कर रही हैं.
रक्तदाता दिवस आज
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मानवता की सेवा का व्रत लेकर थैलीसिमिया पीड़िता को मुहैया करा रहे रक्त
रक्तवीरों की प्रेरणादायक कहानी पूर्णिया के समाज के लिए बन गई है मिसाल
दस साल, 120 महीने और करीब 3 हजार 6 सौ 50 दिनों तक चल रहा सिलसिला
पूर्णिया. साहित्य और राजनीति के मामलें में उर्वरा मानी जाने वाली पूर्णिया की धरती पर रक्तवीरों की भी कमी नहीं. यहां ऐसे भी रक्तवीर हैं जिन्होंने महज दो वर्ष की उम्र में थैलीसिमिया पीड़ित बच्चों को गोद लिया और आज 12 वें साल में भी उसे जिन्दगी दे रहे हैं. रक्तवीरों की इस टीम का संकल्प है कि गोद ली गई इस बच्ची का ब्याह हो जाएगा और वह दूसरे शहर चली जाएगी तब भी उसे वे रक्त देते रहेंगे, साधारण परिवार से आने वाली बच्ची जूही झा और इन रक्तवीरों की प्रेरणादायक कहानी समाज के लिए मिसाल बन गई है.…जब बच्ची को प्रति माह खून की जरुरत थी
वह वर्ष 2016 का दिन था जब निजी शिक्षक अपनी दो वर्ष की बच्ची की जिन्दगी बचाने के लिए शहर के सरकारी और निजी अस्पतालों की धूल फांक रहे थे. डाक्टरों ने बच्ची को थैलीसिमिया पीड़ित बताया था और रक्त की जरुरत थी कहीं उपलब्ध नहीं हो रहा था. आर्थिक अभाव के कारण बच्ची के माता-पिता और अन्य परिजन निराश और हताश हो रहे थे क्योंकि बच्ची को प्रति माह खून की जरुरत थी. ऐसे में, कही से सूचना मिलने पर श्रीराम सेवा संघ के राणा प्रताप सिंह एवं उनकी टीम के लोग आगे आए और मानवता का धर्म निभाते हुए न केवल तत्काल रक्त देकर बच्ची की जान बचायी बल्कि उसे आजीवन रक्त मुहैया कराने का संकल्प भी लिया. बच्ची को जिस समय गोद लिया गया था उसकी उम्र महज दो साल थी और आज वह 12 साल की हो चुकी है. स्वेच्छा से रक्तदान कर बच्ची को जिन्दगी देने का यह सिलसिला दस सालों में 120 महीने और करीब 3 हजार 6 सौ 50 दिनों से चल चुका है. श्रीराम सेवा संघ के राणा प्रताप सिंह कहते हैं कि टीम में दीपू सरीखे कई रक्तवीर हैं जो जरुरतमंदों को रक्त देने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं.
रक्तवीरों की श्रृंखला में कई और नाम भी हैं शामिल
रक्तवीरों की श्रृंखला में सोशल टीम पूर्णिया का नाम भी आता है. टीम पूर्णिया के मेम्बरान उन तमाम जरुरतमंदों को रक्त देकर उनकी जिंदगी बचाने को आगे रहते हैं. यह टीम न केवल थैलीसिमिया पीड़ितों बल्कि वैसे बीमार लोगों को भी रक्त उपलब्ध कराने में आगे रहती है अचानक से रक्त की जरूरत होती है. टीम पूर्णिया का एक व्हाट्सएप ग्रुप बना हुआ है. इसमें बहुत सारे लोग जुड़े हुए हैं. जिस किसी की रक्त की जरूरत होती है, ग्रुप में सन्देश आते ही टीम के सदस्य एक्टिव हो जाते हैं. इसके संस्थापक विकास आदित्य बताते हैं कि ग्रुप में सूचना आने पर पूरी जानकारी ली जाती है और फिर रक्तदान करने के इच्छुक लोगों से सम्पर्क कर उनके द्वारा जरूरतमंदों को मदद उपलब्ध कराया जाता है. इससे बीमार लोगों को नई जिंदगी मिल जाती है और टीम को मानवता की सेवा से संतुष्टि मिलती है.
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