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पुनरीक्षण में वोटर की पात्रता की तीन तारीखों का यह है मतलब

Updated at : 10 Jul 2025 1:13 AM (IST)
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पुनरीक्षण में वोटर की पात्रता की तीन तारीखों का यह है मतलब

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान में चुनाव आयोग ने तीन महत्वपूर्ण तिथियों का साक्ष्य मांगा है.

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शशिभूषण कुंवर, पटना

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान में चुनाव आयोग ने तीन महत्वपूर्ण तिथियों का साक्ष्य मांगा है. आयोग के सूत्रों के अनुसार इसमें स्पष्ट संदेश दिया गया है कि वोट देने का अधिकार भारत में जन्म लेने भर से नहीं, बल्कि भारतीय होने की कानूनी पुष्टि से तय होगा. ये तीन तिथियां नागरिकता अधिनियम, 1955 में समय-समय पर हुए संशोधनों के आधार पर भारतीय नागरिक होने की बदली पात्रताओं के आधार पर तय की गयी हैं. मतदािताओं को अपनी उम्र के अनुसार इन तीन तय मानदंडों को ध्यान में रखते हुए गणना फॉर्म के साथ अपने दस्तावेज जमा करने हैं.

आयोग के सूत्रों के अनुसार, हर पांच साल में हर एक आम नागरिक सरकार बनाने और सरकार में शामिल होने का जनादेश देता है. सवाल यह है कि यह अधिकार किसे मिले. भारत निर्वाचन आयोग ने इतिहास, संविधान और नागरिकता कानून को ध्यान में रखते हुए ये तीन निर्णायक तिथियां तय की हैं. हालांकि चूंकि बिहार में 2003 में मतदाता विशेष पुनरीक्षण कराया गया था, जिसमें इससे संबंधित दस्तावेज जमा लिये गये थे, इसलिए 2003 की मतदाता सूची में शामिल लोगों को सिर्फ उसकी प्रति देना पर्याप्त बताया गया है.

तीन तिथियां, तीन दौर, एक मकसद है सटीक पहचान

पहला साक्ष्य

एक जुलाई 1987 से पहले जन्मे नागरिकों के लिए

नागरिकता अधिनियम 1955 के तहत भारत में जन्मा हर व्यक्ति भारतीय नागरिक माना जा रहा था. माता-पिता कौन थे, कहां से आए, इससे फर्क नहीं पड़ता था. भारतीय भूमि पर जन्म लेना ही नागरिक होने की पहचान थी. नवंबर, 1986 में इस अधिनियम में पहला संशोधन किया गया. इसलिए आयोग 1987 से पहले जन्मे वोटरों से उनकी जन्म तिथि और जन्मस्थान का साक्ष्य मांग रहा है. यह प्रावधान था कि 1955 से एक जुलाई 1987 के बीच भारत में जन्म लेने वाला व्यक्ति भारत का नागरिक है, भले ही उसके माता-पिता की राष्ट्रीयता कुछ भी रही हो.

दूसरा साक्ष्य

एक जुलाई 1987 से तीन दिसंबर, 2004 के बीच जन्मे नागरिक

1986 के संशोधन के लागू होने के बाद नागरिकता की परिभाषा बदल गयी. नागरिकता अब केवल व्यक्ति के जन्मस्थान ही नहीं, बल्कि माता या पिता की नागरिकता पर भी आधारित होगी. इसमें कहा गया कि एक जुलाई, 1987 के बाद भारत में पैदा हुए व्यक्ति को भारत का नागरिक तभी माना जायेगा जब उनके जन्म के समय उसके माता-पिता में से कोई एक भारत का नागरिक हो. विदेशी नागरिकों के बच्चों को भारत की पहचान यूं ही नहीं दी जा सकती.

तीसरा साक्ष्य

तीन दिसंबर, 2004 के बाद जन्मे नागरिक

नागरिकता कानून को 2004 में और सख्त बना दिया गया. संसद में 2003 में पारित नागरिकता संशोधन कानून में कहा गया कि तीन दिसंबर, 2004 को या उसके बाद भारत में जन्म लेने वालों को तभी भारत का नागरिक माना जायेगा, जब उनके माता-पिता दोनों भारत के नागरिक हों. इसी को आधार बनाकर भारत निर्वाचन आयोग ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान को प्रभावी बनाया है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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By RAKESH RANJAN

RAKESH RANJAN is a contributor at Prabhat Khabar.

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