बीजेपी से अब ‘दोस्ताना’ नहीं रहा बिहारी बाबू का

Published at :07 Jan 2016 2:00 PM (IST)
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बीजेपी से अब ‘दोस्ताना’ नहीं रहा बिहारी बाबू का

आशुतोष के पांडेय पटना : ‘कालीचरण’ की काली दुनिया से रूपहले पर्दे पर चर्चित होने वाले शॉटगन यानी बिहारी बाबू इन दिनों फिर से चर्चा में हैं. चर्चा उनकी आत्मकथात्मक किताब को लेकर है. किताब में उन्होंने मिलेनियम स्टार अमिताभ बच्चन के साथ अपने ‘दोस्ताना’ बातों का जिक्र करते हुए बिहारी बाबू ने अपनी ‘शान’ […]

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आशुतोष के पांडेय

पटना : ‘कालीचरण’ की काली दुनिया से रूपहले पर्दे पर चर्चित होने वाले शॉटगन यानी बिहारी बाबू इन दिनों फिर से चर्चा में हैं. चर्चा उनकी आत्मकथात्मक किताब को लेकर है. किताब में उन्होंने मिलेनियम स्टार अमिताभ बच्चन के साथ अपने ‘दोस्ताना’ बातों का जिक्र करते हुए बिहारी बाबू ने अपनी ‘शान’ में कसीदे गढ़े हैं. अपने आपको समकालीन राजनीति में ‘क्रांति’ का अग्रदूत मानते हुए पार्टी पर कई सवाल खड़े किये हैं. बिहारी बाबू ‘वक्त की दीवार’ को थामकर ऐसी ‘नरम-गरम’ बातें किताब में लिखी हैं. जिसे पढ़कर कहीं ‘कयामत’ आने का एहसास होता है तो कहीं ‘खुदगर्ज’ होने का. वैसे ‘कशमकश’ में चल रही उनकी राजनीति में ‘दोस्त’ बोलें तो आडवाणी जी की मुस्कान भर है. वरना राजनीतिक पंडित उन्हीं के बहाने पार्टी के अंदरखाने ‘रक्तचरित्र’ देखने की आस संजोए हुए हैं.

किताब के बहाने पार्टी को किया खामोश

अभिनय की दुनिया से राजनीति की रपटीली राहों मेंआये शत्रु अपनी आत्मकथा ‘एनिथिंग बट खामोश’ में बहुत कुछ चर्चा कर गये हैं. उन चर्चाओं को सियासी दुनिया और उनकी अपनी चमकीली दुनिया अपने-अपने हिसाब से देखेगी लेकिन इतना तय है कि बिहारी बाबू ने खुद की पार्टी में बहार लाने का काम तो नहीं ही किया है. शत्रु अपनी किताब में लिखते हैंकि बिहार के बीजेपी नेता सुशील मोदी नहीं चाहते थे कि शत्रुघ्न सिन्हा पटना से चुनाव लड़ें. शत्रु यह भी लिखते हैं कि सुशील मोदी ने अपनी ओर से उनके लिए गतिरोध पैदा करने की कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी. शत्रु ने खुलकर कहा है कि उनके खिलाफ पार्टी के अंदर गंदी राजनीति काम कर रही है. पार्टी के अंदर कई ऐसे नेता हैं जो 2014 में चुनाव हार गए लेकिन उन्हें मंत्री बना दिया गया. आडवाणी की आभा से प्रभावित शत्रु आज भी मानते हैं कि लालकृष्ण आडवाणी देश के नंबर वन नेता हैं. उन्हें ही पीएम बनाया जाना चाहिए था.

किताब में रेखा के साथ राजेश खन्ना भी

राजनीतिक और सियासी पंडित मानते हैं कि शत्रु ने यह बात कहकर एक बार फिर पार्टी में गुटबाजी की संस्कृति को हवा देने का काम किया है. जिसे आने वाले दिनों में सियासत सुलगाती रहेगी. शत्रुघ्न किताब में कहते हैं. उन्होंने अमिताभ बच्चन के लिए कई बलिदान दिए और कई फिल्में छोड़ दी. उस समय की अभिनेत्रियां रेखा और जीनत की वजह से उनके बीच दरार बढ़ी. शत्रुघ्न यह भी कहते हैं कि दिल्ली में राजेश खन्ना के खिलाफ चुनाव लड़कर उनके दिल को चोट पहुंची. चुनाव में हारना भी मेरे लिए दुख का कारण बना. शत्रु ने कहा कि मुझे इस बात का भी दुख हुआ कि मेरे लिए एक दिन भी आडवाणी जी चुनाव प्रचार नहीं करने आये और चुनाव हारते ही पार्टी ने उन्हें साइडलाइन कर दिया.

शत्रु के बुलाने पर पहुंचे मित्र

शत्रु की किताब विमोचन पर कई पार्टी के नेताओं का जमावड़ा यह साफ बता रहा था शत्रु अपनी पार्टी के लिए भले शत्रु बन गए हों लेकिन बाकी पार्टियों से उनकी मित्रता की टीआरपी ज्यादा है. किताब के विमोचन समारोह में आडवाणी से लेकर यशवंत सिन्हा, किर्ती आजाद और हर्षवर्धन के साथ वी. के. सिंह भी शामिल थे. वहीं सीपीएम नेता सीताराम येचुरी के साथ राजनीति में सबकी सांठ में गांठ बांधने वाले अमर सिंह भी मौजूद थे साथ में कांग्रेस के रणदीप सुरजेवाला भी पहुंचे थे. इन नेताओं के सामने शॉटगन को बीजेपी के प्रति अपनी भड़ास निकालने का सार्थक समय नजर आया और उन्होंने जमकर पार्टी पर हमला बोला.

खुलकर बोले पार्टी के लौहपुरूष

भाजपा में सलाहकार मंडल के शीर्ष पर बैठे आडवाणी को सही मंच नजर आया उन्होंने भी किताब विमोचन के बहाने ही सही, बीजेपी से कई सवाल कर डाले. आडवाणी ने कहा कि कई नेताओं में लोकसभा चुनाव लड़ने का साहस नहीं होता. मैंने शत्रु को लोकसभा चुनाव लड़वाकर अन्याय किया. वहीं यशवंत सिन्हा ने बिहार में शत्रुघ्न सिन्हा से चुनाव प्रचार नहीं कराए जाने को लेकर सवाल खड़ा किया. शत्रु ने बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के बड़बोलेपन पर बोलते हुए कहा कि दो तिहाई बहुमत से चुनाव जीतने की बात बोलना अमित शाह की आदत बन गयी है. और बिहार प्रदेश के नेता अमित शाह के सुर में सुर मिलाते रहने के भी आदी हो गये हैं. शत्रु ने कहा कि मेरी साफ छवि और लोकप्रियता ही मेरी दुश्मन बन बैठी और सुशील मोदी को लगा कि कहीं शत्रुघ्न सिन्हा सीएम ना बन जायें. शत्रु ने बीजेपीके बिहार के कई वरिष्ठ नेताओं को तोता बताया जो सिर्फ रट्टा मारते हैं.

आखिर खामोश कौन ?

किताब के टाइटल में भले ही खामोश शब्द जुड़ा हो लेकिन बिहारी बाबू कतई खामोश नहीं हैं. उन्होंने खामोश के बहाने ही सही दिल की भड़ास निकाल ली. अब बिहार के साथ बीजेपी के केंद्रीय नेता भी पेशोपेश में हैं कि आखिर शत्रु का अगला पड़ा क्या होगा. आने वाले दिनों में असम,पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं. बिहार बाबू को बीजेपी अपने पाले में रखती है या सिर्फ खामोश बनकर रह जायेगी यह सियासत का वक्त तय करेगा.

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