जब नाश मनुज पर छाता है…प्रेमचंद रंगशाला में रश्मिरथी का मंचन हुआइंट्रो – महाभारत के युद्ध को सजीव करता भव्य विराट सीन. कौरवों और पांडवों के बीच संग्राम चला रहा था. चारों ओर से युद्ध की आवाजें सुनाई पड़ती हैं. घोड़ों के हिनहिनाने और हाथियों के चिंघाड़ने की कानों में पड़ती आवाज और इसी बीच अर्जुन को मिला गीता का ज्ञान. युद्ध के मैदान में मोहग्रस्त अर्जुन को श्रीकृष्ण गीता का अमर संदेश दे रहे हैं. ऐसा लगा मानो प्रेमचंद रंगशाला ही कुरूक्षेत्र बन गया है. इसका अनुभव गुरुवार को रामधारी सिंह दिनकर द्वारा लिखित कविता ‘रश्मिरथी’ का नाटक के रूप में मंचन हुआ. यह नाटक आकार संस्था ने प्रस्तुत किया. आशुतोष कुमार के बेहतर निर्देशन और राजू मिश्रा के संगीत ने नाटक में जान डाल दी. यह भीषण युद्ध लगातार 18 दिनों तक जारी रहा था. इसमें लाखों योद्धा मारे गये थे. कुछ इसी तरह का कुरूक्षेत्र का लाइव अनुभव दर्शकों को बहुत दिनों के बाद मंच पर देखने को मिला. लाइफ रिपोर्टर, पटनाजय हो जग में जले जहां भी… गीत के साथ नाटक ‘रश्मिरथी’ की शुरुआत होती है. इसके बाद राजमहल में अर्जुन अपना पराक्रम दिखाता है. इस पर कर्ण, अर्जुन से कहता है कि मैं आप से बेहतर प्रदर्शन कर सकता हूं. सभी लोग उसे कहते हैं कि तुम राजघराने से नहीं हो, सभी ओर से उसका अपमान होने लगता है. यह देख कर दुर्योधन उसे अंग देश का राजा बना देता है और यहीं से दोनों में दोस्ती हो जाती है. जैसे-जैसे नाटक आगे बढ़ता है, वैसे-वैसे लोग नाटक में डूब जाते हैं. नाटक का आकर्षक क्षणइस नाटक में सूत्रधार रश्मरथी की पंक्तियां पढ़ कर कहानी को आगे बढ़ाता है. सूत्रधार की आवाज के साथ नाटक चलते रहता है. यह क्षण बड़ा ही आकर्षक था. इसकी कुछ पंक्तियां हैं: वर्षों तक वन में घूम-घूम, बाधा विघ्नों को चूम-चूम, सह धूप घाम पानी पत्थर, पांडव आये कुछ और निखर. सौभाग्य न सब दिन होता है, देखें आगे क्या होता है. मैत्री की राह दिखाने को, सब को सुमार्ग पर लाने को. दुर्योधन को समझाने को, भीषण विध्वंस बचाने को, भगवान हस्तिनापुर आये, पांडव का संदेशा लाये, दो न्याय अगर तो आधा दो, पर इसमें भी यदि बाधा हो, तो दे दो केवल पांच ग्राम, रखो अपनी धरती तमाम. यही बात समझाने के लिए श्रीकृष्ण दुर्योधन के पास गये, लेकिन दुर्योधन गुस्से में भगवान श्रीकृष्ण को ही बांधने चला. इसके बाद सूत्रधार कहता है, जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है. इतना कहते ही हरि ने भीषण हुंकार किया, अपना स्वरूप विस्तार किया. डगमग-डगमग दिग्गज डोले, भगवान कुपित हो कर बोले, जंजीर बढ़ा अब साध मुझे, हां…हां दुर्योधन बांध मुझे, ये देख गगन मुझमें लय है, ये देख पवन मुझमें लय है, मुझमें विलीन झनकार सकल, मुझमें लय है संसार सकल.अमरत्व फूलता है मुझमें, संहार झूलता है मुझमें, भूतल अटल पाताल देख, गत और अनागत काल देख, ये देख जगत का आदि सृजन, ये देख महाभारत का रण. मृतकों से पटी हुई भू है, पहचान कहां इसमें तू है. अंबर का कुंतल जाल देख, पद के नीचे पाताल देख. मुट्ठी में तीनों काल देख, मेरा स्वरूप विकराल देख. सब जन्म मुझी से पाते हैं, फिर लौट मुझी में आते हैं. जिह्वा से काढती ज्वाला सघन, सांसों से पाता जन्म पवन, पर जाती मेरी दृष्टि जिधर, हंसने लगती है सृष्टि उधर. रश्मिरथी का यह संदेश इसी तरह सूत्रधार के माध्यम से चलता रहता है. पूरा हॉल गंभीर मुद्रा में कुरूक्षेत्र का अनुभव ले रहा थे. कलाकारों के प्रदर्शन और सूत्रधार की बातों पर हॉल में तालियां गूंज रही थीं. कथासार कुछ यह हैसमाज में हर वह इंसान पूजा जाता है, जो त्याग और बलिदान का सूचक होता है. कर्ण भी हमारे समाज का एक ऐसा योद्धा था जो तपस्वी, त्यागी और दानवीर था. उसने जीवन के सभी मूल्यों को दान के सामने फीका कर दिया. खुद का नुकसान हो जाये मगर जरूरतमंद की मदद करना उसकी प्राथमिकताएं रहीं. राष्ट्रकवि दिनकरजी की रचित रचना रश्मिरथी उन्हीं बातों का सूचक है. इस काव्य में रश्मिरथी नाम कर्ण का है क्योंकि उसका चरित्र पुण्यमय है. कर्ण महाभारत का अत्यंत यशस्वी पात्र है. कर्ण जिंदगी भर वो सम्मान नहीं पा सका जिसका वह हकदार था. कुंती ने कर्ण को कभी अपना बेटा नहीं माना. मगर जब यह पता चला कि कौरवों और पांडवों में युद्ध होने वाला है, युद्ध में कर्ण पांडवों पर भारी पड़ सकता है. तब कुंती ने कर्ण को सच बात बतायी और अपने भाइयों के साथ युद्ध न करने की बात कही. मगर कर्ण नहीं माना और वह कौरवों की तरफ से लड़ा. अंत में श्रीकृष्ण की मदद से छल से कर्ण का वध हुआ. नाटक में महाभारत के युद्ध को दरसाया गया है.
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Prabhat Khabar Digital Desk
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