लोकतंत्र की मजबूती के लिए जरूरी है ‘नोटा’
Updated at : 20 Mar 2019 6:53 AM (IST)
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भारत 14वां राष्ट्र है जिसने नोटा के विकल्प को चुना है, इससे राजनीति की दिशा बदल सकती राजीव कुमार, राज्य समन्वयक एडीआर भारत 14वां राष्ट्र है जिसने नोटा के विकल्प को चुना है. 16वीं बिहार विधानसभा के लिए चुनाव में नोटा का जबरदस्त प्रभाव देखा गया था. इसने 23 सीटों पर सीधे तौर पर परिणाम […]
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भारत 14वां राष्ट्र है जिसने नोटा के विकल्प को चुना है, इससे राजनीति की दिशा बदल सकती
राजीव कुमार, राज्य समन्वयक एडीआर
भारत 14वां राष्ट्र है जिसने नोटा के विकल्प को चुना है. 16वीं बिहार विधानसभा के लिए चुनाव में नोटा का जबरदस्त प्रभाव देखा गया था. इसने 23 सीटों पर सीधे तौर पर परिणाम को प्रभावित किया था. इन 23 सीटों पर जितने मतों के अंतर से जीत हासिल हुई, उससे कहीं अधिक नोटा के पक्ष में बटन दबे. यह चुनाव इस मायनों में भी खास रहा, क्योंकि मतदाताओं ने कई पार्टियों की तुलना में नोटा को ज्यादा वोट दिया. नोटा से समीकरण बदल सकता है. राजनीति की दिशा बदल सकती है. यह लोकतंत्र के लिए जरूरी है.
दुनिया भर में नोटा से जुड़ी अनेक कहानियां हैं, किन्तु सबसे दिलचस्प कहानी हैं पोलैंड एवं रसिया की. 1989 में पौलेंड में कम्युनिस्ट की सरकार थी. उस सरकार ने चुनाव को प्रभावित करने का प्रयास किया.
विपक्ष में कोई खड़े नहीं थे, लेकिन जनता उक्त सरकार को नापसंद करती थी. जनता ने बैलेट पेपर पर उम्मीदवार का नाम काट कर मतपेटी में डाल दिया जिस वजह से पुन: मतदान करवाना पड़ गया. 1991 में सोवियत संघ में भी यही हुआ. 200 से अधिक सीटों पर नोटा की वजह से उम्मीदवारों को हार का मुंह देखना पड़ा. पुनर्मतदान नये उम्मीदवारों के साथ कराये गये, क्योंकि वर्तमान उम्मीदवारों को नोटा ने हरा दिया था. हारने वाले सौ से अधिक कम्युनिस्ट थे.
दुर्भाग्यजनक तौर पर 2006 में नोटा को रूस में हटा दिया गया. सुप्रीम कोर्ट ने 27 सितंबर, 2013 को पीयूसीएल द्वारा दाखिल की गयी जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग को इवीएम में उपरोक्त में से कोई नहीं (नोटा) का बटन लगाने का आदेश दिया था. ताकि मतदाता किसी को भी वोट नहीं देना चाहते हों, वह अपना वोट गोपनीयता बनाये रखते हुए अपने विकल्प का इस्तेमाल कर सकें. जब राजनीतिक दलों को यह पता चलेगा तो व्यवस्था में घीरे-धीरे बदलाव आयेगा. राजनीतिक दल ऐसे उम्मीदवार खड़े करने के लिए मजबूर होंगे, जो लोगों को स्वीकार्य हों और अपनी इमानदारी के लिए जाने जाते हों.
नोटा भारत में नकारात्मक फीडबैक देने का काम करने लगा है. हाल में महाराष्ट्र और हरियाणा स्टेट इलेक्शन कमीशन की पहलकदमी से नोटा के प्रति भरोसा जगा है. 6 नवंबर, 2018 को महाराष्ट में स्टेट इलेक्शन कमीशन ने एक आदेश पास किया है, जिसमें कहा गया कि नोटा को यदि बहुमत मिल जाता है तो पुर्नमतदान कराया जायेगा.
22 नवंबर, 18 को हरियाणा स्टेट इलेक्शन कमीशन ने भी यही निर्णय लिया. इसकी एक वजह थी कि महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनाव में कई ऐसी सीटें थीं जिसमें नोटा को बहुमत मिला था. पुणे के एक पंचायत में नोटा को 85 प्रतिशत वोट मिल गया. यही ऑर्डर यदि देशव्यापी हो जाये तो उम्मीद है देश में नोटा की प्रासंगिता बढ़ जायेगी. मुख्य चुनाव आयुक्त कहते हैं कि हमारे पास शक्ति नहीं है, जिससे हम नोटा को प्रभावकारी बना सकें.
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