पटना : पुलिस की तलाश अधूरी, बच्चे की चिंता में कट रही मां की पूरी रात
Updated at : 19 Dec 2018 7:33 AM (IST)
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15 से 20% लापता बच्चों का नहीं लग पाता सुराग अनुज शर्मा पटना : यह कहानी उन बच्चों की है, जो गायब हैं और जिनका सुराग नहीं मिल पा रहा है. किसी के पास इसका जवाब नहीं है कि इन बच्चों को धरती निगल गयी या आसमान. इन बच्चों की मांओं का बुरा हाल है. […]
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15 से 20% लापता बच्चों का नहीं लग पाता सुराग
अनुज शर्मा
पटना : यह कहानी उन बच्चों की है, जो गायब हैं और जिनका सुराग नहीं मिल पा रहा है. किसी के पास इसका जवाब नहीं है कि इन बच्चों को धरती निगल गयी या आसमान. इन बच्चों की मांओं का बुरा हाल है. ऐसी हजारों मांएं हैं.
प्रत्येक साल लापता होने वाले कुल बच्चों में 15 से 20% घर नहीं लौट रहे हैं. भटके हुए बच्चे अथवा बाल मजदूरी करने वाले तो कभी-न-कभी घर आ जाते हैं. पर बड़ी तादाद में बच्चों के नहीं लौटने का दर्द हजारों परिवार अब भी झेल रहे हैं.
बच्चों के गायब होने की कई वजहें है. कभी पढ़ाई के डर से तो कभी दूसरे कारणों से भाग जाते हैं. पर इनमें ऐसे भी हैं जो मानव तस्करी के चंगुल में फंसने की वजह से घर नहीं लौट पाते. मानव तस्करी के शिकार बच्चों की तलाश में पूरा तंत्र असहाय नजर आता है. नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार 2016 में बिहार से 4325 लड़कियां और 1087 लड़के लापता हुए.
इनमें 595 लड़कियां और 484 लड़के कहां और कैसे लापता हुए, उनके बारे में कोई सुराग नहीं है. जनवरी 2018 से 30 सितंबर 2018 तक लापता हुए 4838 बच्चों में 2112 का पुलिस सुराग नहीं लगा सकी है. इनमें पटना से लापता बच्चों की संख्या 491 है. पूर्वी चंपारण जिले से नौ माह के दौरान लापता 325 बच्चों में केवल 174 ही ढूंढ़े जा सके हैं. इस साल मधुबनी से लापता बच्चों में से 12 का सुराग नहीं मिला है, जिनमें पांच लड़कियां हैं.
तलाश करना अकेले पुलिस के वश में नहीं: नैयर
टाटा इंस्टीट्यूट आॅफ सोशल साइंस मुंबई के चेयर प्रोफेसर पीएम नैयर (रिटायर्ड डीजीपी) का कहना है कि करीब एक तिहाई बच्चों के घर न लौटने के लिए पुलिस और प्रशासन में समन्वय का अभाव सबसे बड़ा कारण है.
लापता बच्चों की छानबीन कर पाना अकेले पुलिस के बस की बात नहीं है. इसके लिए पुलिस, स्थानीय प्रशासन और पंचायत को मिलकर एक सिस्टम बनाना होगा. समाज कल्याण विभाग, श्रम विभाग, जीआरपी, आरपीएफ को अपनी जिम्मेदारी गंभीरता से निभानी होगी. बच्चों के न मिलना कई विभागों की असफलता है.
सीमाई इलाके में सक्रिय है स्लीपर सेल
एनजीओ भूमिका शिल्पी ने कहा कि राज्य के सीमाई इलाके में बच्चियों को गायब करने में स्लीपर सेल की बड़ी भूमिका है. कटिहार, किशनगंज, अररिया जैसे इलाकों में लड़कियों के गायब होने के वाकये सामने आते हैं. इसी महीने कटिहार के एक स्कूल से दो बच्चियां अचानक गायब हो गयीं. ग्रामीण इलाकों में स्लीपर सेल का मजबूत नेटवर्क है.
केस-1
पटना की अंजू को इंतजार है अपने बेटे का, जो 2007 से लापता है. हर पल वह बेटे की राह देखती रहती हैं. कहती हैं कि उस वक्त ढांढ़स बंधाया गया था. सुराग देने वाले के लिए एक लाख इनाम की भी घोषणा की गयी. पर बेटा अब तक नहीं मिला है.
केस-2
भागलपुर के पीरपैंती प्रखंड के बाखरपुर के रहनेवाले अभिषेक कुमार (15 वर्ष) पांच महीने से गायब है. इस मामले में पीरपैंती में 22 अगस्त को प्राथमिकी दर्ज करायी गयी थी. पर वह बच्चा आज तक नहीं मिला. परिजनों का बुरा हाल है. अब वे जाएं तो जाएं कहां?
केस-3
भागलपुर के ही परबत्ता थाने के जगतपुर की रहनेवाली अनु कुमारी (10 वर्ष) इस वर्ष 19 सितंबर को गायब हो गयी थी. परिजनों ने काफी पड़ताल की. लेकिन उसका पता नहीं चल पाया. परिजन पुलिस में गये. छानबीन हो रही है.
बच्चों की तलाश को ये भी कदम
मानव तस्करी वाले क्षेत्रों की पहचान कर इसमें शामिल लोगों पर कार्रवाई को भी अभियान चलेगा
पुलिस दूसरे राज्यों में जाकर वहां के चिल्ड्रेन होम में बिहार के बच्चों की खोज करेगी
कहीं बाल मजदूरी करने वाले बच्चों की भी पहचान करने को अभियान चलाया जायेगा
हर थाने को एक प्रारूप की बुकलेट दी जायेगी
हर माह दो दिन चलेगा महाअभियान : एडीजी
एडीजी, सीआईडी विनय कुमार ने कहा कि लापता बच्चों की तलाश को लेकर बड़ा अभियान चलेगा. राज्य भर में मिसिंग बच्चों का डाटा अपडेट करने को कहा गया है. राज्य में हर साल औसतन छह हजार बच्चे लापता होते हैं.
प्रत्येक थाना क्षेत्र में दो दिन महाअभियान चलेगा. लापता बच्चों के बारे में पंचायत प्रतिनिधि, वार्ड मेंबर पंच, सरपंच , मुखिया आदि की मदद ली जायेगी. सीआईडी यह जानकारी जुटाएगी कि बच्चा आकर फिर कहीं और तो नहीं चला गया.
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