पटना : अब बोरिंग नहीं होगी फेल, पहले होगी जलस्तर की जांच, जांच पर खर्च होंगे नौ लाख रुपये
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 26 Nov 2018 5:34 AM
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प्रमोद झा 15 जिलाें में टेरामीटर से जांच के बाद लगायी जायेंगी बोरिंग, हो रहा जिओफिजिकल सर्वे पटना : बोरिंग लगाने के बाद पानी नहीं मिलने की शिकायत अब नहीं होगी. बोरिंग लगाने से पहले ही जमीन के भीतर पानी की समुचित मात्रा के होने या नहीं होने का पता लगा लिया जायेगा. इससे बोरिंग […]
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प्रमोद झा
15 जिलाें में टेरामीटर से जांच के बाद लगायी जायेंगी बोरिंग, हो रहा जिओफिजिकल सर्वे
पटना : बोरिंग लगाने के बाद पानी नहीं मिलने की शिकायत अब नहीं होगी. बोरिंग लगाने से पहले ही जमीन के भीतर पानी की समुचित मात्रा के होने या नहीं होने का पता लगा लिया जायेगा. इससे बोरिंग करने के बाद उसके फेल होने की समस्या दूर होगी.
इसके लिए पहले टेरामीटर से जांच कर देख लिया जायेगा कि जमीन के भीतर किस जगह पानी की उपलब्धता अधिक है. ऐसी जगहों को चिह्नित कर वहां बोरिंग लगाने का काम होगा. दक्षिण बिहार में पठारी इलाके सहित अन्य जगहों पर पानी की समस्या अधिक है. खासकर गर्मी के दिनों में जलस्तर काफी नीचे चला जाता है. इससे पानी का संकट और गहरा जाता है.
यहां तक कि पानी के लिए बोरिंग लगाने के बाद भी गर्मी के दिनों में बोरिंग काम करना बंद कर देती है. लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग 15 जिलों नालंदा, रोहतास, कैमूर, गया, औरंगाबाद, नवादा, जहानाबाद, भागलपुर, बांका, मुंगेर, जमुई, शेखपुरा व लखीसराय में जमीन के भीतर जिओफिजिकल सर्वेक्षण करा कर पानी की मात्रा की जांच करायेगा. टेरामीटर से पानी की मात्रा जांच कराने पर करीब नौ लाख रुपये खर्च होंगे.
बोरिंग करने के बाद होती है पानी की समस्या
लोगों को जलापूर्ति की सुविधा मिले इसके लिए बोरिंग की जाती है. बोरिंग लगायी भी जाती है, लेकिन बाद में पानी नहीं मिलने से वह फेल हो जाती है.
ऐसे में पैसा खर्च हो जाता है, लेकिन लाभ नहीं मिल पाता है. विभाग द्वारा दक्षिण बिहार के पठारी इलाके में सौ से 125 मीटर तक बोरिंग लगाने का काम होता है. इसके बाद भी कई बार बोरिंग फेल होने की शिकायत आती है. बोरिंग लगाने में होने वाले खर्च के बाद कांट्रैक्टर दूसरी जगह बोरिंग गाड़ने में आनाकानी करते हैं.
नतीजा उस इलाके में लोगों को जलापूर्ति सुविधा नहीं मिलती है. अगर कांट्रैक्टर दूसरी जगह बोरिंग लगाते हैं तो उसमें अतिरिक्त खर्च होने वाली राशि नहीं मिलने से कांट्रैक्टर को परेशानी होती है. इससे बचने के लिए विभाग ने टेरामीटर से जमीन के भीतर पानी की उपलब्धता की जांच के लिए जिओफिजिकल सर्वेक्षण करा रहा है.
जांच पर खर्च होंगे नौ लाख रुपये
विभाग ने 15 जिलों में टेरामीटर से जमीन के भीतर पानी की उपलब्धता की जांच के लिए राशि निर्धारित की है. इन जिलों में ड्रिल्ड या ग्रैवेल पैक्ड चापाकल व उच्च जल प्रदायी नलकूप लगाया जाना है. टेरामीटर से पानी की मात्रा जांच कराने पर लगभग नौ लाख रुपये खर्च होंगे.
विभाग ने औरंगाबाद व जमुई के लिए चार लाख अनठानवे हजार 296 रुपये आवंटित किया है. अभियंता प्रमुख ने औरंगाबाद व जमुई के कार्यपालक अभियंता को भेजे पत्र में काम शुरू कराने से पहले सक्षम पदाधिकारी से दरों की स्वीकृति प्राप्त कर लेने का निर्देश दिया है. आवंटित राशि का खर्च स्वीकृत योजना पर ही करना है.
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