पाण्डेयगंगौट की मड़ही पूजा बनी सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल, देशभर से पहुंचे श्रद्धालु

Author Dashrath mistri|Edited by Yuvraj Ratan
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महान सूफी संत की समाधि  स्थल है पाण्डेय गंगौट में दो दिवसीय मड़ही पूजा का समापन

बाबा के दरबार में उजुरदारी करते अनुयायी

Nawada News : कौआकोल की मड़ही पूजा सामाजिक समरसता और सांप्रदायिक सौहार्द का अद्भुत संगम है। महंत बाबा एवं नंद बाबा की स्मृति में आयोजित यह उत्सव हर साल देशभर से श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है।

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Nawada News : कौआकोल प्रखंड के पाण्डेयगंगौट गांव स्थित महंत बाबा एवं नंद बाबा की समाधि स्थल पर आयोजित होने वाली मड़ही पूजा सामाजिक समरसता, सांप्रदायिक सौहार्द और मानवता का अनूठा प्रतीक मानी जाती है. उत्तर प्रदेश के बाराबंकी स्थित देवा शरीफ के महान सूफी संत वारिस पिया के अनुयायी पंचवदन बाबू उर्फ महंत बाबा एवं नंद बाबा की स्मृति में आयोजित इस वार्षिकोत्सव में हर वर्ष बिहार समेत विभिन्न राज्यों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं.

वर्ष में दो बार लगता है भव्य उर्स और मेला

नवादा जिला मुख्यालय से करीब 25 किलोमीटर पूर्व नवादा-रोह मुख्य मार्ग पर स्थित यह पवित्र स्थल कौआकोल प्रखंड के अंतर्गत आता है. यहां प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास की द्वितीया तिथि तथा आषाढ़ मास की 18वीं तिथि को महंत बाबा एवं नंद बाबा की स्मृति में उर्स और दो दिवसीय मेले का आयोजन किया जाता है. विभिन्न धर्मों और संप्रदायों के लोग यहां मन्नतें मांगने और बाबा का आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं.

सूफी भजनों के साथ होती है पूजा की शुरुआत

मड़ही पूजा समिति के सदस्यों के अनुसार, आयोजन की शुरुआत सूफी एवं वारसी भजन गायन से होती है. इसके बाद महंत बाबा और नंद बाबा की समाधि का विधिवत शुद्धिकरण किया जाता है. समाधि पर यज्ञोपवीत (जनेऊ), धोती, कुर्ता (मिरजई), टोपी सहित श्रृंगार सामग्री अर्पित की जाती है. इसके बाद 56 प्रकार का भोग लगाकर श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना और प्रार्थना की जाती है.

सरकारी चादरपोशी की भी निभाई जाती है परंपरा

पूजा के दौरान सरकारी स्तर पर भी चादरपोशी और पूजा की परंपरा निभाई जाती है. मन्नत पूरी होने पर दूर-दराज से आए श्रद्धालु समाधि पर चादर और प्रसाद चढ़ाते हैं. सभी श्रद्धालुओं को बारी-बारी से समाधि पर माथा टेकने और दर्शन करने का अवसर मिलता है.

हिन्दू-मुस्लिम एकता का देता है संदेश

पाण्डेयगंगौट की मड़ही पूजा हिन्दू-मुस्लिम एकता और सामाजिक समरसता का प्रतीक मानी जाती है. यहां सभी धर्मों, जातियों और समुदायों के लोग बिना किसी भेदभाव के एक साथ पूजा-अर्चना करते हैं. वार्षिकोत्सव के अंतिम दिन बाबा का प्रसाद श्रद्धालुओं के बीच वितरित किया जाता है, जो आपसी भाईचारे और सद्भाव का संदेश देता है.

मुंडन संस्कार और मन्नत का विशेष महत्व

मड़ही पूजा में मुंडन संस्कार का विशेष महत्व माना जाता है. संतान प्राप्ति की कामना करने वाले श्रद्धालु यहां मन्नत मांगते हैं. मन्नत पूरी होने पर वे अपने बच्चों का विधि-विधान से मुंडन संस्कार कराते हैं. इस परंपरा को लेकर श्रद्धालुओं में गहरी आस्था देखने को मिलती है.

देशभर से पहुंचते हैं वारिस पिया के अनुयायी

महंत बाबा के इस वार्षिकोत्सव में उत्तर प्रदेश के देवा शरीफ सहित देश के विभिन्न राज्यों से वारिस पिया के अनुयायी और श्रद्धालु शामिल होते हैं. इस वर्ष भी शुक्रवार से शुरू हुआ दो दिवसीय धार्मिक आयोजन शनिवार देर रात संपन्न हुआ. आयोजन के दौरान लगे मेले में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया और धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल होकर बाबा का आशीर्वाद प्राप्त किया.

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