देश से विदेश तक होती रही है पुष्पा की पूछ

Updated at : 17 Apr 2016 7:00 AM (IST)
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देश से विदेश तक होती रही है पुष्पा की पूछ

संवेदनशीलता, सहनशीलता व संकल्पशक्ति के बूते पुष्पा ने अपनी जिंदगी की तसवीर बदली है, रफ्तार बदली है, अलग मुकाम तय किया है. समाज में अपने कामकाज से एक नया प्रतिमान गढ़ा है. आखिर तभी तो नवादा के कौआकोल में बिना चप्पल खेतों की मेड़ों से होकर चलते हुए वह न केवल देश के कोने-कोने तक […]

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संवेदनशीलता, सहनशीलता व संकल्पशक्ति के बूते पुष्पा ने अपनी जिंदगी की तसवीर बदली है, रफ्तार बदली है, अलग मुकाम तय किया है. समाज में अपने कामकाज से एक नया प्रतिमान गढ़ा है. आखिर तभी तो नवादा के कौआकोल में बिना चप्पल खेतों की मेड़ों से होकर चलते हुए वह न केवल देश के कोने-कोने तक पहुंच गयीं, बल्कि विदेश की धरती पर भी इनके पांव पड़ गये.

डब्ल्यूएचओ के कार्यक्रम में ढाका भी बुलवायी गयी थीं.

1969 में कौआकोल के धनावां गांव में जनमी पुष्पा के बारे में तब किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि बिल्कुल बेदम और निरीह दिखती पुष्पा इस तरह नये-नये मुकाम हासिल करेंगी. वह भी घोर कठिन चुनौतियों से जूझ कर.

भाषणों में ही नहीं, व्यवहार में भी महिला सशक्तीकरण व समाजहित को समर्पित पुष्पा के

अजय कुमार

नवादा : नारी प्रधान समाज का सोच हमें विकास की मूल धारा में नहीं आने देगा. समतामूलक समाज की अवधारणा ठोस रूप ले सके, इस पर ही हमें काम करना चाहिए. हमें ऐसे वातावरण विकसित करने पर बल देना होगा, जहां लड़कियों को भी लड़कों जैसा लाड़-प्यार, शिक्षा-दीक्षा व तमाम किस्म की पारिवारिक-सामाजिक सुविधाएं मिलें. महिलाओं के ऐसे विकास की बात नहीं सोचनी चाहिए, जिससे पुरुष पिछड़ जाये. पुरुषों को रोक कर महिलाओं को आगे बढ़ा देने से समाज का भला नहीं होनेवाला. दोनों का ध्यान रखते हुए सामंजस्यपूर्ण विकास की बात करनी होगी. ये बातें एक ऐसी महिला की हैं, जिसकी जिंदगी शुरू ही हुई थी घोर कठिन चुनौतियों के बीच. ऐसे परिवेश में, जिसमें अभाव का कोई अभाव नहीं था.

केवल कमियां ही दिखती थीं चारों ओर. नाम है उनका पुष्पा कुमारी. जिन वजहों से वह चर्चा के केंद्र में हैं, वो हैं उनकी संवेदनशीलता, सहनशीलता व संकल्पशक्ति. मानो पुष्पा इन गुणों की खान हों. इनके बूते उन्होंने अपनी जिंदगी की तसवीर बदली है, रफ्तार बदली है, अलग मुकाम तय किया है. समाज में अपने कामकाज से एक नया प्रतिमान गढ़ा है. आखिर तभी तो नवादा के कौआकोल में बिना चप्पल खेतों की मेड़ों से होकर चलते हुए वह न केवल देश के कोने-कोने तक पहुंच गयीं, बल्कि विदेश की धरती पर भी इनके पांव पड़ गये. डब्ल्यूएचओ के कार्यक्रम में ढाका बुलवायी गयी थीं. 1969 में कौआकोल के धनावां गांव में जनमी पुष्पा के बारे में तब किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि बिल्कुल बेदम और निरीह दिखती पुष्पा इस तरह नये-नये मुकाम हासिल करेंगी. वह भी घोर कठिन चुनौतियों से जूझ कर.

भाषणों में ही नहीं, व्यवहार में भी महिला सशक्तीकरण व समाजहित को समर्पित पुष्पा के पिता अर्जुन सिंह व माता बसंती देवी ने काफी कठिनाई के बीच रह कर उनका लालन-पालन किया था.

मुश्किल भरे हालात में पढ़ाया-लिखाया. लेकिन, तब के माहौल व रीति-रिवाज के हिसाब से 1982 में महज 13 वर्ष की उम्र में पुष्पा की शादी हो गयी. गया जिले में फतेहपुर के पास धनगावां में. पर, वह शादी के बाद भी पारिवारिक रस्म के मुताबिक अपने मायके में ही थीं. कोई छह वर्ष बाद 1988 में 19 वर्ष की आयु में ससुराल गयीं. एक माह के लिए. उसी वर्ष उनके पति का निधन हो गया. यानी वैवाहिक जिंदगी अत्यंत छोटी रही.

इतने कम दिनों में किसी विवाहिता का विधवा होना समाज की दृष्टि में अच्छा नहीं था. ऐसी महिलाओं को समाज सम्मान की नजर से देखे, तब इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. पुष्पा के ससुराल का जीवनकाल इतना छोटा था कि लोग उन्हें बाल-विधवा की श्रेणी में ही रखते. अब उनकी जिंदगी में यह एक नयी चुनौती थी. खैर, वह ससुराल से अपने मायके चली आयी थीं और तब से ही अपने पिता के परिवार में रह रही हैं. मायके में ही रह कर पुष्पा अपने को संभालने की कोशिश करने लगीं. पढ़ाई-लिखाई में जुट गयीं.

पांचवी तक तो गांव में ही पढी थीं. आठवीं तक रूपौ के मिडिल स्कूल में. हाइस्कूल गांव से दूर था. पांडेय गंगोट में. पर, अपने पिता की सहमति से वह अपनी बहन के साथ वहां जाकर भी पढ़ने लगीं. इस दौरान भी मुफलिसी साथ लगी रही. हद तो तब हो गयी, जब एक बार स्कूल में ही चप्पल चोरी हो गयी. पुष्पा के लिए यह कोई छोटी समस्या नहीं थी. क्योंकि, उनके बाबूजी के लिए दूसरा चप्पल खरीद पाना आसान नहीं था.

फिर क्या था, खाली पैर ही दिन कटने लगे. खेतों की मेड़ से होकर गांव से स्कूल और स्कूल से गांव की दूरी तय होने लगी. देखते-देखते मैट्रिक की परीक्षा नजदीक आ गयी. यह भी एक बड़ी मुसीबत. बोर्ड की इस पहली परीक्षा के लिए पैसे भी लगनेवाले थे. तंगहाली के शिकार पिता ने भैंस बेची, तो परीक्षा के लिए पैसे का जुगाड़ हुआ. इसी दौरान पुष्पा कुमारी के व्यक्तित्व में लीडरशिप की झलक दिखने लगी थी. पिता वामपंथी विचारों के प्रभाव में थे. इसका असर पुष्पा पर भी हुआ. वह सामाजिक उद्देश्य के तरह-तरह के कार्यक्रमों से जुड़ने लगीं. 1992 में भारत ज्ञान-विज्ञान समिति से जुड़ीं. इसके कार्यक्रमों के लिए प्रशिक्षण लीं. आगे चल कर जनवादी महिला समिति का हिस्सा बनीं. इन संगठनों के कार्यक्रमों के तहत देश में उत्तर से दक्षिण व पूरब से पश्चिम तमाम प्रांतों में आना-जाना हुआ.

देश के सामाजिक ताना-बाना को समझने का अवसर मिला. उसमें खुद को खोजने का भी अवसर साथ था. क्योंकि, यह महिलाओं की भारतीय दुनिया को देखने का अच्छा मौका था. पुष्पा कुमारी 1994 के उन दिनों को याद करती हैं, जब उन्होंने नवादा में लड़कियों को साइकिल सिखाने के लिए प्रशिक्षण अभियान चलाया था. कहती हैं, बहुत सुखद दौर था वह. आज देखिए, क्या चल रहा है? सरकार क्या कर रही है? साइकिल बांट रही है न? हमने इस आवश्यकता को करीब दो दशक पहले ही भांप लिया था. अपनी कार्यकुशलता के लिए लोगों के बीच जानी-पहचानी जानेवाली पुष्पा कुमारी विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक कार्यक्रम में बांग्लादेश की राजधानी ढाका बुलायी गयीं. वहां दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से आयी महिलाओं से मिलीं.

एक और नया अनुभव था यह, जो आगे चल कर काम आया. 2006 में उन्हें हिसुआ की भदसेनी पंचायत में शिक्षक की नौकरी मिल गयी. तीन वर्ष बाद मुख्यमंत्री अक्षर आंचल योजना से भी जुड़ीं.

त्रुटिहीन कामकाज देख कर इन्हें स्टेट रिसोर्स पर्सन भी बना दिया गया. नवादा और शेखपुरा की जिम्मेवारी मिली. बखूबी इसका निर्वहन भी किया. इनके कामकाज का असर था कि 2011 में इन्हें मौलाना अबुल कलाम आजाद शिक्षा पुरस्कार देकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सम्मानित किया. लेकिन, जुझारू व्यक्तित्व की धनी पुष्पा कुमारी सम्मान के प्रभाव से विचलित नहीं हुईं. वह लगातार काम कर रही हैं. वह जिस पंचायत में शिक्षक की नौकरी पायीं, उसी के भदसेनी गांव में पार्ड नाम की एक संस्था से भी जुड़ गयीं.

यहीं पास के दौलतपुर गांव (जहां पुष्पा का स्कूल है) की महिलाओं की बदहाली देख. उनसे बातचीत कीं. इन लाचार महिलाओं को साथ लाकर स्वयंसहायता समूहों का गठन करवाया. इन्हें आत्मनिर्भरता के लिए प्रेरित किया. वे जब आगे बढ़ीं, तो एक और सपना साकार हो गया. आज भदसेनी की महिलाओं के खाते में लगभग 25 लाख से ज्यादा की जमा पूंजी है.

यह सब उस पुष्पा की पहल पर संभव हो सका, जिनके पास कभी चप्पल खरीदने के लिए 25 रुपये भी नहीं थे. पुष्पा कहती हैं, खाते में जमा धन इन महिलाओं की अपनी कमाई का है. इस पैसे से ये एक-दूसरे की मदद करती हैं. गांव का दृश्य बदल रही हैं. उल्लेखनीय है कि दौलतपुर गांव देश के मशहूर फुटबॉलर मेवालाल की जन्मभूमि है. उनके नाम पर पुष्पा कुमारी अपने प्राइमरी स्कूल को गर्ल्स हाइस्कूल में उत्क्रमित करवाना चाहती हैं, ताकि पास-पड़ोस की लड़कियों को पढ़ने के लिए दूर न जाना पड़े.

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