सफाई पर सब रहे खामोश

Updated at : 13 Apr 2016 7:25 AM (IST)
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सफाई पर सब रहे खामोश

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वच्छता अभियान की शुरुआत होते ही लोगों ने हाथों में झाड़ू लेकर खूब वाहवाही बटोरी. सैकड़ों की संख्या में लोगों ने कार्यक्रम किये. लेकिन, जब नगर पर्षद के सफाईकर्मी हड़ताल पर रहे तो शहर की सड़कों पर गंदगी पसरी दिखने लगी. चौक-चौराहों से बदबू आने लगी. पर, किसी ने सफाई के […]

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वच्छता अभियान की शुरुआत होते ही लोगों ने हाथों में झाड़ू लेकर खूब वाहवाही बटोरी. सैकड़ों की संख्या में लोगों ने कार्यक्रम किये. लेकिन, जब नगर पर्षद के सफाईकर्मी हड़ताल पर रहे तो शहर की सड़कों पर गंदगी पसरी दिखने लगी. चौक-चौराहों से बदबू आने लगी. पर, किसी ने सफाई के लिए हाथों में झाड़ू नहीं उठाये़
नवादा कार्यालय : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वच्छता अभियान को हरी झंडी क्या दिखायी समाज के तथाकथित रहनुमाओं को पंख लग गये. हर किसी ने हाथों में झाड़ू थामा और जुट गये गलियों की सफाई में. सैकड़ों की संख्या में लोगों ने कार्यक्रम किये. जम कर फोटो शूट हुआ.
मीडिया कवरेज हुई. अखबारों के लोकल पन्ने का हर कोना सफाई की खबरों से पट गया. रोज कोई न कोई संस्था और इससे जुड़े लोग आगे आते. किसी एक गली या सड़क पर आते ही मीडिया को फोन घुमाते. साफ सड़कों पर अपने चकाचक कपड़ों में हाथों में झाड़ू लिये फोटो करवाते और कार्यक्रम संपन्न हो जाता. गांधी जयंती के अवसर पर दो अक्टूबर, 2015 को शुरू हुए इस राष्ट्र व्यापी कार्यक्रम के बाद लगा हमने सफाई के मूल मंत्र को अपना लिया है.
अब इसके लिए किसी के भरोसे की जरूरत नहीं है. पर, पांच अप्रैल, 2016 के बाद शहर की जो हालत हुई, इससे हर किसी को शर्मसार होना चाहिए. पर यह भी नहीं हुआ. हम बड़ी ढिठाई के साथ अपने घरों में सुकून से रहे. शहर कचरे के ढेर पर आ गया. सड़कों पर गंदगी पसरा दिखने लगा. चौक-चौराहों से बदबू आने लगी. रोज सफाईकर्मियों की हड़ताल की खबरें अखबारों की सुर्खियां बनने लगी. आम लोग मजे लेकर खबरें पढ़ते रहे. पर, किसी ने झाड़ू नहीं उठायी. देखते ही देखते चैत नवरात्रा शुरू हो गया.
चार दिवसीय चैती छठ की भी शुरुआत हो गयी. यह सब कुड़े के ढेर पर रह रहे उस शहर में हो रहा था, जहां के लोग स्वच्छता अभियान की शुरुआत के साथ प्रधानमंत्री की तारीफ करते नहीं अघाते थे. 33 वार्डों वाले शहर में स्वच्छता का जिम्मा अब भी उन 97 स्थायी व अस्थायी सफाईकर्मियों पर ही है. इसे हम समाज के सबसे नीचे के पायदान पर विकास की जद्दोजहद करते देखते हैं. सोमवार को हड़ताल खत्म हुई और मंगलवार से इन सबों ने अपने काम संभाल लिये. अक्सर आम लोगों की चर्चा में यह बात शामिल होती है कि सफाई हमारा निजी दायित्व है. सफाई नैतिक मूल्यों से जुड़ा है. हमें अपनी गंदगी साफ करने में संकोच नहीं होना चाहिए. पर, छह दिनों की घटना ने हमें आइना दिखाया है.
इसमें हमारा चेहरा सिर्फ एक नगरवासी की रही हैं, जो सरकार को टैक्स देकर हर काम के लिए उनसे उम्मीद लगाये बैठे है. दो अक्तूबर के बाद के दिनों में जिला प्रशासन से लेकर स्वयंसेवी संस्थाओं, मुहल्लों में युवाओं की टोली, जनप्रतिनिधि, राजनैतिक दल, निर्वाचित प्रत्याशी, महिला संगठन हर कोई इस मुहिम में जुटा था. हाथों में झाड़ू के अलावा बैनर व मोदी जी को आभार देते स्लोगन. मानो उन्होंने जीवन की राह दिखायी हो. पर,यह सब खबरों तक सिमट कर रह गया. हमने इसे जीवन में उतारा नहीं. यह हमारी शर्मिंदगी की इंतहा रही.
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