बारिश के अभाव में धान की फसल में झोंका रोग

Updated at : 17 Sep 2015 9:15 AM (IST)
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बारिश के अभाव में धान की फसल में झोंका रोग

उदासी. जिले के किसान हुए बेहाल,पूंजी डूबने की आशंका बिहारशरीफ़ : बारिश न होने व तापमान बढ़ जाने के साथ ही किसानों की परेशानियां बढ़ती जा रही है़ बारिश नहीं होने और खेतों के सूखने से धान की फसलों में कई प्रकार के रोग लगने से किसान परेशान हैं. कीटनाशकों का छिड़काव भी फायदेमंद साबित […]

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उदासी. जिले के किसान हुए बेहाल,पूंजी डूबने की आशंका
बिहारशरीफ़ : बारिश न होने व तापमान बढ़ जाने के साथ ही किसानों की परेशानियां बढ़ती जा रही है़ बारिश नहीं होने और खेतों के सूखने से धान की फसलों में कई प्रकार के रोग लगने से किसान परेशान हैं. कीटनाशकों का छिड़काव भी फायदेमंद साबित नहीं हो पा रही है.
किसानों को अपनी जमा पूंजी डूबने का डर सता रहा है. किसान करें तो क्या करें, समझ में नहीं आ रहा है. किसानों के समक्ष विकट समस्या पैदा हो गयी है. एक तो बारिश नहीं होने की वजह से किसानों का धान की फसल को बचाये रखने की जद्योजहद करनी पड़ रही है. ऊपर से फसल को रोग -व्याधियों के प्रकोप से बचाने के लिए जमा पूंजी लगानी पड़ रही है.
झोंका रोग से पत्तियां हो रही पीली: धान की फसल में इन दिनों झोंका रोग (बैक्टिेरियल लीफ ब्लाइट) का प्रकोप तेजी से हो रहा है. इस रोग में धान के पौधे की नीचली पत्ती ऊपर से पीला होती जा रही है. धान की फसल में कल्ले फूटने के समय पत्तियों के शीर्ष भाग पर भूरी धारियां बनती हैं.
लोग इसे ‘लाल’ कहते हैं. यह पत्ती के किनारे के साथ फैल जाती है. इस रोग से प्रभावित भागों से सुबह के समय दुधिया बूंदे निकलती है. बुंदा-बांदी होने व तापमान बढ़ने के साथ इस रोग का प्रकोप बढ़ जाता है.
पत्ती लपेटक कीड़े का प्रकोप: बरसात का अंतिम समय होने के कारण इन दिनों पत्ती लपेटक कीड़ों का प्रकोप बढ़ गया है. इस रोग में पिल्लू पत्ती के दोनों किनारों को मोड़ कर आपस में मिला देता है. कीड़े पत्ती का हरा पदार्थ खुरच कर खाता है. इसकी वजह से पत्तियां सफेद दिखाई देती है और बाद में सूख जाती है.
बेहाल किसान अधिकारी व वैज्ञानिक से लगा रहे गुहार: नगरनौसा के किसान बिजेन्द्र प्रसाद,बीरेन्द्र प्रसाद,नूरसराय के किसान कविन्द्र कुमार,अलखदेव प्रसाद,थरथरी के किसान रामदहिन महतो,अस्थावां के रामजी प्रसाद,हरनौत के विलास महतो,रहुई के नरेश प्रसाद,बेन के साधु जी आदि ने बताया कि धान की फसल में लगी रोगों से किसानों की जमा पूंजी डूबने की आशंका पैदा हो गयी है. हैरान-परेशान किसानों ने इसकी सूचना केवीके कृषि वैज्ञानिकों के साथ विभाग के अधिकारियों को भी दी है.
‘धान की फसल में झोंका रोग लग गया तो इस हालत में खेत में अधिक पानी व अधिक यूरिया का प्रयोग नहीं करना चाहिए. इस रोग पर नियंत्रण के लिए एस्ट्रेप्टो साइक्लिन एक ग्राम दवा प्रति पांच लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें. इसके अलावा हेक्साकोनाजोल एवं केपटॉन का मिश्रण जो कि बिहार में ‘ताकत’ एवं ‘बॉक्सर’ के नाम से उपलब्ध है.
इस दवा का दो ग्राम प्रति पांच लीटर पानी में मिला कर शाम के समय छिड़काव करें. छिड़काव करते समय घोल में शैम्पू का एक पाउच मिला दें. पत्ती लपेटक रोग की रोकथाम के लिए प्रोपनोफौस साइपर मैथीन का मिश्रण, जो मरीना या गुणली के नाम से आता है. इन दवाओं का एक एमएल प्रति पांच लीटर पानी में मिला कर छिड़काव करें. कुछ फायदा हो तो दस दिन बाद फिर से इनका छिड़काव करें. इससे किसानों को फायदा होगा. ‘
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