वैभारगिरि पर मिली 11वीं सदी की मूर्ति
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :06 Feb 2019 6:35 AM (IST)
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नालंदा विवि और बिहार विरासत विकास समिति अनुसंधान टीम ने खोजा राजगीर (नालंदा) : भगवान बुद्ध एवं महावीर की धरती राजगीर के वैभारगिरी पर्वत के ऊपर से 11वीं शताब्दी की एक प्राचीन मूर्ति बरामद की गयी है. यह मूर्ति ग्रेनाइट काले पत्थर से बनी है. अनुमान लगाया जा रहा है कि यह मूर्ति भगवान महावीर […]
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नालंदा विवि और बिहार विरासत विकास समिति अनुसंधान टीम ने खोजा
राजगीर (नालंदा) : भगवान बुद्ध एवं महावीर की धरती राजगीर के वैभारगिरी पर्वत के ऊपर से 11वीं शताब्दी की एक प्राचीन मूर्ति बरामद की गयी है. यह मूर्ति ग्रेनाइट काले पत्थर से बनी है. अनुमान लगाया जा रहा है कि यह मूर्ति भगवान महावीर के पिता सिद्धार्थ और उनकी माता त्रिशला की है. यह मूर्ति उक्त पहाड़ पर झाड़ियों से नालंदा विश्वविद्यालय के छात्रों ने बरामद किया है. नालंदा विश्वविद्यालय के मीडिया प्रभारी सह परियोजना प्रमुख डॉ मयंक शेखर ने बताया कि बिहार विरासत विकास समिति व नालंदा विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में चलाये जा रहे परियोजना राजगीर पुरातत्व सर्वेक्षण परियोजना के अंतर्गत अनुसंधान टीम ने शनिवार को वैभारगिरी पर्वत पर अनुसंधान के लिए गयी हुई थी.
पहाड़ पर अवस्थित श्रीधन्ना शालीभ्रद जैन श्रेतांबर मंदिर के पीछे 40 मीटर की दूरी पर यह अद्वितीय और सुंदर मूर्ति झाड़ियों के बीच पड़ी हुई थी. इसी के पास एक प्राचीन जैन मठ भी है. उन्होंने कहा कि इस मूर्ति का आयाम लगभग 63 सेमी ऊंची, 35 सेमी चौड़ी व 13 सेमी चौड़ी है. परियोजना प्रमुख नालंदा विश्वविद्यालय डॉ मयंक शेखर ने बताया कि यह मूर्ति संभवतः जैन धर्म के 24 वें तीर्थंकर से संबंधित है. मूर्ति पर उनके पिता सिद्धार्थ बाई तरफ जो वज्र धारण किये हुए है. जबकी उनकी माता त्रिशला दायीं तरफ कमल पीठ पर विराजमान हैं, उनके हाथों में एक शिशु भी है. जिसे महावीर स्वामी का बाल रूप माना जा रहा है.
ललितासन मुद्रा में दोनों आकृतियां कमल आसन पर विराजमान है. वहीं उनके नीचे सुखासन मुद्रा में पांच पुरुष आकृतियां भी हैं. जबकि बुद्ध जैसी एक आकृति ऊपर एक वृक्ष पर पद्मासन मुद्रा में विराजमान हैं. बिहार विरासत विकास समिति पटना के कार्यकारी निदेशक एवं इस संस्था की ओर से परियोजना प्रमुख डॉ. विजय चौधरी ने इस खोज की सराहना की है. डॉ मयंक शेखर ने पूरी परियोजना टीम और परियोजना समन्वयक आजाद हिंद गुलशन नंदा के शोध व प्रयासों की प्रशंसा की.
नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सुनैना सिंह ने इस खोज के लिए प्रोजेक्ट टीम की सराहना करते हुए कहा कि सदियों से नालंदा ज्ञान का केंद्र रहा है. इसने पूरे एशिया महाद्वीप के विद्वानों को आकर्षित किया. नालंदा विश्वविद्यालय पुनः एक बार अपने उसी गौरवशाली परंपरा को प्राप्त करने की दिशा में यात्रा करने को तैयार है.
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