मुजफ्फरपुर: नगर निगम के ठेकेदारों की ‘एकता’ टूटी, विरोध के बीच 39 योजनाओं पर गिरा टेंडर

Published by : Sarfaraz Ahmad Updated At : 26 May 2026 7:44 PM

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मुजफ्फरपुर नगर निगम की योजनाओं के टेंडर बहिष्कार के बीच अंतिम समय में 39 योजनाओं पर आवेदन डाले जाने से संवेदकों की एकता टूट गई. अब ठेकेदारों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है. पढ़ें पूरी खबर...

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मुजफ्फरपुर से देवेश कुमार की रिपोर्ट

Muzaffarpur News: मुजफ्फरपुर नगर निगम में विकास योजनाओं के टेंडर को लेकर चल रहा संवेदकों का विरोध आखिरकार बिखर गया. निगम की कार्यशैली और कथित कमीशनखोरी के खिलाफ एकजुटता का दावा करने वाले ठेकेदारों की “एकता” टेंडर प्रक्रिया के अंतिम दो दिनों में टूट गई.

अंदरखाने हुए इस खेल के बाद संवेदकों के बीच दो फाड़ की स्थिति बन गई है और अब वे एक-दूसरे पर गुप्त समझौते का आरोप लगा रहे हैं.

58 योजनाओं के बहिष्कार का लिया गया था फैसला

करीब एक सप्ताह पहले नगर निगम के संवेदकों की बैठक हुई थी. बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया था कि 25 लाख रुपये से कम लागत वाली सड़क और नाला निर्माण की 58 योजनाओं के टेंडर का सामूहिक बहिष्कार किया जाएगा और कोई भी संवेदक आवेदन नहीं देगा.

लेकिन टेंडर प्रक्रिया के अंतिम दो दिनों में पूरा समीकरण बदल गया. सूत्रों के अनुसार, कुछ संवेदकों ने गुप्त रूप से 58 में से 39 योजनाओं पर टेंडर डाल दिया.

इन योजनाओं में कई पर दो से अधिक दावेदार सामने आए हैं, जबकि कुछ ग्रुप में आठ-आठ आवेदन तक जमा किए गए हैं. अब केवल 19 योजनाएं ऐसी बची हैं, जिन पर या तो किसी ने आवेदन नहीं दिया या फिर सिंगल टेंडर डाला गया है.

30 प्रतिशत कम रेट और कमीशनखोरी से नाराज थे संवेदक

संवेदकों की नाराजगी के पीछे नगर निगम की कार्यशैली को प्रमुख वजह बताया जा रहा है.

ठेकेदारों का आरोप है कि सरकारी निर्धारित दर से करीब 30 प्रतिशत कम रेट पर टेंडर डालने का दबाव बनाया जाता है. इसके अलावा निगम के भीतर और बाहर कथित रूप से कमीशन मांगने की भी चर्चा है.

संवेदकों के बीच यह आरोप लगाया जा रहा है कि जनप्रतिनिधियों से लेकर उनके करीबी लोगों तक विभिन्न स्तरों पर कमीशन की मांग की जाती है, जो कुल मिलाकर करीब 18 प्रतिशत तक पहुंच जाती है.

संवेदकों का यह भी कहना है कि कार्य पूरा होने के बावजूद भुगतान की फाइलें विकास शाखा से लेकर नगर आयुक्त कार्यालय तक महीनों लंबित रखी जाती हैं. कई मामलों में तीन से छह महीने तक भुगतान अटका रहता है.

उनका कहना है कि ऐसी स्थिति में काम करना घाटे का सौदा बन गया है.

दूसरे लाइसेंस से डाले गए टेंडर

बहिष्कार की घोषणा के बाद टेंडर डालने को लेकर अब संवेदकों के बीच अविश्वास गहरा गया है.

सूत्रों के अनुसार, शहर के कई नामी और प्रभावशाली संवेदकों ने संगठन और अपने गुट के सामने साख बचाने के लिए सीधे अपने नाम से आवेदन नहीं दिया. इसके बजाय कुछ नए और अपरिचित लोगों के लाइसेंस का इस्तेमाल कर बैकडोर से टेंडर डाले गए.

इस खुलासे के बाद संवेदकों के विभिन्न गुटों में भारी नाराजगी है और एक-दूसरे पर अंदरखाने समझौता करने का आरोप लगाया जा रहा है.

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लेखक के बारे में

By Sarfaraz Ahmad

सरफराज अहमद IIMC से प्रशिक्षित पत्रकार हैं. राजनीति, समाज और हाइपरलोकल मुद्दों पर लिखते हैं. क्रिकेट और सिनेमा में गहरी रुचि रखते हैं. बीते तीन वर्षों से मीडिया क्षेत्र में सक्रिय हैं और वर्तमान में प्रभात खबर की डिजिटल टीम के साथ कार्यरत हैं।

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