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Muzaffarpur Flood: बाढ़ में 150 परिवारों का सहारा बनता 200 साल पुराना वटवृक्ष, जीवन संघर्ष का रहा गवाह

Updated at : 09 Jul 2021 12:25 PM (IST)
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Muzaffarpur Flood: बाढ़ में 150 परिवारों का सहारा बनता 200 साल पुराना वटवृक्ष, जीवन संघर्ष का रहा गवाह

कांटी के धमौली रामनाथ पूर्वी स्थित विशाल वटवृक्ष 200 से अधिक वर्षों से बाढ़ पीड़ितों के जीवन संघर्ष का गवाह रहा है. एक बार फिर इसकी छाया में सैकड़ों परिवारों ने आशियाना बनाना शुरू किया है. 60 साल के विशाल सहनी गीली मिट्टी पर प्लास्टिक के बाेरे पर लेटे कराह रहे हैं. शरीर बुखार से तप रहा है. घर के नाम पर प्लास्टिक का तंबू है. वह कहते हैं- कई दिनों से तबीयत खराब है. उठा बैठा नहीं जा रहा. एकाएक घर में कल पानी घुस आया. टेंपू पर लाद कर पड़ोसियों ने यहां पहुंचा दिया. सुबह तेज बारिश हुई. ऊंची जगह नहीं होने के कारण तंबू के नीचे जमीन गीली हो गयी. मजदूरी कर घर का एक-एक सामान जुटाया था. सब पानी में बह गया. घर में कोई और नहीं. गरीबों की सालों की जमा खुशियां बाढ़ ऐसे ही बहा ले जाता है.

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संजय झा,मुजफ्फरपुर: कांटी के धमौली रामनाथ पूर्वी स्थित विशाल वटवृक्ष 200 से अधिक वर्षों से बाढ़ पीड़ितों के जीवन संघर्ष का गवाह रहा है. एक बार फिर इसकी छाया में सैकड़ों परिवारों ने आशियाना बनाना शुरू किया है. 60 साल के विशाल सहनी गीली मिट्टी पर प्लास्टिक के बाेरे पर लेटे कराह रहे हैं. शरीर बुखार से तप रहा है. घर के नाम पर प्लास्टिक का तंबू है. वह कहते हैं- कई दिनों से तबीयत खराब है. उठा बैठा नहीं जा रहा. एकाएक घर में कल पानी घुस आया. टेंपू पर लाद कर पड़ोसियों ने यहां पहुंचा दिया. सुबह तेज बारिश हुई. ऊंची जगह नहीं होने के कारण तंबू के नीचे जमीन गीली हो गयी. मजदूरी कर घर का एक-एक सामान जुटाया था. सब पानी में बह गया. घर में कोई और नहीं. गरीबों की सालों की जमा खुशियां बाढ़ ऐसे ही बहा ले जाता है.

बच्चे को मचान पर छोड़ के भागे

वटवृक्ष के चारों तरफ लीची के बगान हैं. एक छोटा स्कूल है. चार कमरे हैं. सभी बंद. स्कूल का ही चापाकल है, जो बाढ़ पीड़ितों की प्यास बुझा रहा. तंबू बनाने में जुटी छोटी सी बच्ची परी की मां रेणु देवी कहती है- एकाएक घर में पानी घुस गेलई. सामान के के पूछई छइ. पांच साल के मनीषवा के घर में मचान पर छोड़ के अलइह ह. अलइयइ जब त कमर भर पानी रहइ. अब बढ गेलई ह. नाव के इंतजार में छिअइ. बेटी बांस काट के ललकई ह. तूंब बन जतई त लबई. रेणु को चिंता है कि उसका बेटा मनीष कहीं घर से निकल पानी में खेलने न चला जाये. उसे तैरना भी नहीं आता.

खुद का ठिकाना नहीं, मवेशी को क्या खिलाएं

वटवृक्ष के नीचे तकरीबन 150 परिवार किसी तरह आ चुके हैं. कोई टेंपू या सिर पर सामान के साथ तो कोई ऊंची जगह सामान रखकर. जान की फिक्र है. वार्ड पार्षद देवेंद्र सहनी कहते हैं. करीब 500 परिवार अब भी फंसे हैं. हमने सीओ साहब को फोन किया सरकारी नाव के लिए. कल से ही वे कह रहे हैं कि भेज रहे हैं. पर अब तक नहीं आया. देवेंद्र का घर भी डूब गया है. मवेशी का घास काटते गणेश सहनी ने बताया कि खेत में सब्जी सहित सारी फसल डूब गयी. मवेशी के लिए चारे का संकट है. यहां अपने खाने के लिए अनाज नहीं ला पा रहे तो मवेशी के लिए कैसे जुगाड़ करें. घर में भूसे का टाल था, पानी में सब बर्बाद हो गया.

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बीच मंझदार में जाकर नाविक मांगते हैं 500 रुपये

चंद्रभान चौक से गोसाईपुर जानेवाले रास्ते पर बांध तक पानी आ चुका है. सरकारी निर्देश पर एक शिक्षक विनोद सहनी आते हैं. कहते हैं- सीओ साहब का फोन आया था. पांच नाविकों को नाव के साथ लेकर आया हूं. वे तैयार नहीं थे. पिछली बार का उनको पैसा नहीं मिला. इस बार भी मिलेगा या नहीं, क्या गारंटी है. उनको अपनी गारंटी पर लेके आया हं. मोहन सहनी कहते हैं- निजी नाव वाले काफी मनमानी करते हैं. बीच मझधार में ले जाकर दो सौ रुपये मांगते हैं. हार कर टेंपू पर लाद कर गर्दन भर पानी होते हुए आया हूं. एक बजे सरकारी नाव आने के बाद लोग राहत की सांस लेते हैं. धीरे-धीरे सब इस पार अपने सामान के साथ आने लगे हैं. जलस्तर में अब भी बढ़ोतरी ही हो रही है. किनारे खड़े लोग कहते हैं. इस बार प्रलय ही होगा.

Posted By: Thakur Shaktilochan

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