यज्ञ न केवल दैवीय शक्तियों की आराधना है और न यंत्रों की, यह प्रेम की आराधना है : स्वामी निरंजनानंद

Updated at : 11 Sep 2024 7:17 PM (IST)
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यज्ञ न केवल दैवीय शक्तियों की आराधना है और न यंत्रों की, यह प्रेम की आराधना है : स्वामी निरंजनानंद

बिहार योग विद्यालय के परमाचार्य स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने कहा कि यज्ञ न केवल दैवीय शक्तियों की आराधना है और न यंत्रों की, यह प्रेम की आराधना है.

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प्रतिनिधि, मुंगेर. बिहार योग विद्यालय के परमाचार्य स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने कहा कि यज्ञ न केवल दैवीय शक्तियों की आराधना है और न यंत्रों की, यह प्रेम की आराधना है. वह प्रेम जो हमें गुरुतत्व की उपस्थिति में अनुभव होता है. वे बुधवार को पादुका दर्शन में चल रहे श्री लक्ष्मीनारायण महायज्ञ के चौथे दिन उपस्थित संत व श्रद्धालुओं को संबोधित कर रहे थे. उन्होंने कहा कि हमारे परमगुरु स्वामी शिवानंद प्रेम के अवतार थे. वे कहते थे कि प्रेम का संबंध हर व्यक्ति के साथ होना चाहिए. लोकोत्थान का आधार भी प्रेम ही होता है. जिस प्रकार स्वामी सत्यानंद ने अपने गुरु की शिक्षाओं का प्रसाद सबके साथ बांटा और आज भी बांट रहे हैं. वह ईश्वर, गुरु और मानव जाति के प्रति उनके प्रेम को दर्शाता है. उन्होंने कहा कि इस महायज्ञ में तीन प्रसिद्ध वैष्णव मंदिरों से प्रसाद का आना भी तो ईश्वर का प्रेम पूर्ण आशीर्वाद है. यह हमारे लिए बड़े सौभाग्य की बात है कि हम गुरु और ईश्वर की उपस्थिति से सुशोभित इस आह्वान में भाग ले रहे है. आज एक विशेष संयोग यह भी बना कि आज राधा अष्टमी है. स्वामी शिवानंद तो राधा-कृष्ण के भक्तों में अग्रणी हैं. इसका मतलब यह संपूर्ण आराधना उस परम गुरु तक को समर्पित है, जिनकी असीम कृपा हम सभी पर निरंतर बरस रही है. उन्होंने कहा कि प्रेम की अभिव्यक्ति हृदय से होती है और देवघर में स्थित रिखियापीठ से हमारे बीच स्वामी सत्यसंगानंद की उपस्थिति ने यज्ञ के इस प्रेममय वातावरण में चार चांद लगा दिये. स्वामी सत्यसंगानंद ने अपना संदेश देते हुए कहा कि इस मांगलिक यज्ञ में आकर वे बेहद खुश है. गंगा के किनारे बैठकर स्त्रोतों का पाठ करने से मन और हृदय दोनों ही प्रेम व ऊर्जा से भर गये हैं. हम इस विश्वप्रेम का अनुभव तब ही कर पायेंगे जब हमारा मन बिल्कुल खाली हो. अभी जो प्रेम हम व्यक्त करते हैं वह हमारे खुद के स्वार्थ तक ही सीमित है. जो हमें उस दिव्य शक्ति से दूर रखे हुए है. सत्संग के पश्चात वाराणसी के विद्वान पंडितों ने श्री सूक्तम व नारायण सूक्तम से हवन जारी रखा. दोपहर के सत्र में सहस्त्रार्चन का कार्यक्रम आयोजित किया गया.

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