गंगा किनारे बसे 18 पंचायतों के लोग आर्सेनिक युक्त पानी पीकर हो रहे बीमार

Updated at : 04 Mar 2025 7:33 PM (IST)
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गंगा किनारे बसे 18 पंचायतों के लोग आर्सेनिक युक्त पानी पीकर हो रहे बीमार

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कैंसर जैसी घातक बीमारी होने की बढ़ गयी है आशंका

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मुंगेर.

गंगा के मैदानी इलाकों के भूजल में भारी मात्रा में आर्सेनिक पाया जाता है. मंगेर जिले के 18 पंचायत ऐसे हैं जो गंगा किनारे मैदानी इलकों में बसे हुए हैं. यहां के निवासी आर्सेनिक युक्त पानी पीने से बीमार पड़ रहे हैं. हाल यह है कि आर्सेनिक के लंबे समय तक संपर्क ने विषाक्तता को कई गुना बढ़ा दिया है. इससे कैंसर जैसी घातक बीमारी होने की आशंका काफी बढ़ गयी है.

178 वार्ड के लोग पी रहे आर्सेनिक युक्त पानी

पीएचईडी की ओर से समय-समय पर पानी में फ्लोराइड, आयरन, आर्सेनिक समेत अन्य कई तरह की जांच करायी जाती है. इसमें यह खुलसा हुआ है. पीएचईडी मुंगेर की मानें तो जिले के 18 पंचायत के 178 वार्ड हैं, जो गंगा के मैदानी इलाकों में अवस्थित हैं. यहां के लोग आर्सेनिक युक्त पानी पीने को विवश है. बरियारपुर प्रखंड नौ पंचायत बरियारपुर साउथ, करहरिया पूर्वी व पश्चिमी, झौवाबहियार, कल्याण टोला, हरिणमार, बरियारपुर नार्थ शामिल हैं. मुंगेर सदर के सात पंचातय कुतलुपुर दियारा, मोहली, टीकारामपुर, नौवागढ़ी उत्तरी व दक्षिणी, जाफनगर, तारापुर दियारा, धरहरा प्रखंड के शिवकुंड व हेमजापुर, जमालपुर प्रखंड के सिंघिया व इटहरी के ग्रामीण आर्सेनिक युक्त पानी पीने को विवश हैं.

कैंसर जैसी बीमारी का खतरा

जानकारों की मानें तो पानी में आर्सेनिक की मात्रा ज्यादा होने से कैंसर जैसी गंभीर बीमारी होने का खतरा बढ़ जाता है. खास बात है कि आर्सेनिक वाले पानी से फसल की सिंचाई करने से यह कृषि उत्पादों में भी पहुंच जाता है. ऐसे उत्पादित अनाज को हम लगातार खा रहे हैं. आर्सेनिक युक्त पानी से उत्पादित होने वाले अनाज के सेवन से भी हम बीमार पड़ रहे हैं. गंगा के किनारे बसे गांवों में हजारों लोग त्वचा, किडनी, लीवर और दिल की बीमारियों, न्यूरो संबंधी विकारों, तनाव और कैंसर की चपेट में आ रहे हैं.

कहते हैं पीएचईडी के कार्यपालक अभियंता

पीएचईडी के कार्यपालक अभियंता अभिरंजन ने बताया कि सरकारी स्तर पर जो भी चापानल व हर घर नल का जल के तहत डीप बाेरिंग की गयी है. उसमें आर्सेनिक की मात्रा खत्म करने के लिए फिल्टर लगाया जाता है. हर तीन माह में उस क्षेत्र में संचालित बोरिंग व चापानल के पानी की जांच की जाती है. जबकि तीन साल में उस फिल्टर को बदला जाता है.

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