125 वर्षों से आस्था का केंद्र है हवेली खड़गपुर का प्राचीन काली मंदिर, जहां हर मन्नत होती है पूरी

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मंदिर में कामेश्वर महाराज द्वारा स्थापित काली मां की प्रतिमा.

मंदिर में कामेश्वर महाराज द्वारा स्थापित काली मां की प्रतिमा.

Haveli Kharagpur Ancient Kali Temple : हवेली खड़गपुर का प्राचीन काली मंदिर दो शताब्दियों से आस्था का केंद्र है. राज दरभंगा द्वारा स्थापित इस मंदिर में 125 वर्षों से बलि की परंपरा निभाई जा रही है, और यह सामाजिक एकता का भी प्रतीक है.

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Haveli Kharagpur Ancient Kali Temple : हवेली खड़गपुर नगर परिषद के मुख्य बाजार के बीचोंबीच स्थित प्राचीन काली मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान भी है. राज दरभंगा द्वारा स्थापित इस मंदिर का इतिहास करीब दो शताब्दियों पुराना है. वर्षों से यह मंदिर श्रद्धा, परंपरा और लोकविश्वास का प्रमुख केंद्र बना हुआ है.

राज दरभंगा ने कराई थी मंदिर की स्थापना

मंदिर के इतिहास के अनुसार वर्ष 1831 के आसपास राज दरभंगा ने इस प्राचीन काली मंदिर का निर्माण कराया और यहां कीमती धातु की मां काली की प्रतिमा स्थापित कराई. उस दौर में राज दरभंगा ने बिहार के विभिन्न क्षेत्रों में कई प्रसिद्ध मंदिरों का निर्माण कराया था. हवेली खड़गपुर का बड़ा दुर्गा मंदिर भी वर्ष 1841 में उनके संरक्षण में स्थापित हुआ. प्राचीन काली मंदिर को राज दरभंगा द्वारा स्थापित प्रमुख काली मंदिरों में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है.

125 वर्षों से निभाई जा रही है बलि की परंपरा

करीब 125 वर्षों से प्रत्येक मंगलवार और शनिवार को श्रद्धालु यहां पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं. विशेष रूप से दुर्गापूजा की नवमी के दिन अपनी मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालु मां काली को बकरे की बलि अर्पित करते हैं. इस परंपरा को स्थानीय लोग आज भी पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ निभाते हैं.

दुर्गापूजा में यहीं होता है मां काली से प्रतिमाओं का मिलन

दुर्गापूजा के दौरान हवेली खड़गपुर प्रखंड क्षेत्र में स्थापित एक दर्जन से अधिक मां दुर्गा और मां काली की प्रतिमाओं को विसर्जन से पहले इसी प्राचीन काली मंदिर लाया जाता है. यहां मां काली से प्रतीकात्मक मिलन और विशेष आरती के बाद ही प्रतिमाओं का मणि नदी अथवा जोड़ी पोखर में विसर्जन किया जाता है. यह परंपरा वर्षों से क्षेत्र की धार्मिक पहचान बनी हुई है.

शेर और लकड़बग्घे के माथा टेकने की भी है लोकमान्यता

मंदिर से जुड़ी एक प्राचीन किवदंती भी स्थानीय लोगों के बीच प्रचलित है. मान्यता है कि कई दशक पहले प्रत्येक मंगलवार को जंगल का राजा शेर और लकड़बग्घा मंदिर पहुंचकर मां काली के दरबार में माथा टेकते थे. आश्चर्य की बात यह थी कि वे मंदिर में मौजूद किसी भी श्रद्धालु को नुकसान पहुंचाए बिना वापस जंगल लौट जाते थे. इस लोकविश्वास के कारण मंदिर की महिमा और भी बढ़ जाती है.

महाआरती और विकास समिति ने बदली मंदिर की तस्वीर

वर्ष 2009 में मंदिर में नियमित महाआरती की परंपरा शुरू की गई. इसके बाद दिसंबर 2009 में मंदिर के विकास के लिए पूजा समिति का गठन किया गया. समिति के प्रयासों से मंदिर का व्यापक जीर्णोद्धार हुआ और इसकी भव्यता में लगातार वृद्धि हुई. आज मंदिर का आकर्षक स्वरूप श्रद्धालुओं और पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है.

पुजारी परिवार पीढ़ियों से कर रहा है सेवा

मंदिर के वर्तमान पुजारी मंटू झा उर्फ मायानंद मिश्र बताते हैं कि वर्ष 1953 से 2007 तक उनके पिता स्वर्गीय शिवशंकर मिश्र यहां के पुजारी रहे. उनके बाद मंदिर की पूजा-अर्चना की जिम्मेदारी उन्हें मिली. उन्होंने बताया कि आज भी दरभंगा महाराज की ओर से मंदिर के पुजारी को प्रतिमाह मानदेय प्रदान किया जाता है, जिससे इस ऐतिहासिक परंपरा का निर्वहन जारी है.

आस्था के साथ सामाजिक एकता का भी केंद्र

प्राचीन काली मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक है. यहां हर वर्ग और समुदाय के लोग मां काली के दर्शन के लिए पहुंचते हैं. स्थानीय लोगों का मानना है कि यह मंदिर रिश्तों को जोड़ने, सामाजिक समरसता बढ़ाने और क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को संजोने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है.


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