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ऐतिहासिक काली पहाड़ी पर कल उमड़ेगा जन सैलाब

जमालपुर: जमालपुर स्थित काली पहाड़ी सदियों से प्राकृतिक छटाओं को लेकर आकर्षण का केंद्र रहा है. संभवत: यहां के प्राकृतिक सौंदर्य को देखकर ही अंगरेजों द्वारा यहां रेल इंजन कारखाना की नींव डाली गयी थी. समीप के इस्ट कॉलोनी तब अंगरेज रेल अधिकारियों का आवास रहा था. इसी काली पहाड़ी की तराई में जमालपुर और […]

जमालपुर: जमालपुर स्थित काली पहाड़ी सदियों से प्राकृतिक छटाओं को लेकर आकर्षण का केंद्र रहा है. संभवत: यहां के प्राकृतिक सौंदर्य को देखकर ही अंगरेजों द्वारा यहां रेल इंजन कारखाना की नींव डाली गयी थी. समीप के इस्ट कॉलोनी तब अंगरेज रेल अधिकारियों का आवास रहा था. इसी काली पहाड़ी की तराई में जमालपुर और आसपास के लोग नववर्ष के अवसर पर पिकनिक एवं वनभोज को आनंद लेने अपने परिवार समेत आते हैं.

अति प्राचीन है काली पहाड़ी . काली पहाड़ी का उल्लेख धार्मिक ग्रंथों में भी किया गया है. यह महाभारत कालीन प्राचीनता समेटे हुए है. बताया जाता है कि महाभारत काल में जब पांडव द्युत क्रीड़ा में हार गये थे. तब अज्ञातवास के दौरान वे पांचाली के साथ काली पहाड़ी पर कुछ समय व्यतीत किये थे. इस दौरान पांडु पुत्र अजरुन द्वारा यहां मां यमला काली की प्रतिमा स्थापित की गयी थी. जिसकी पूजा करने यहां साल भर सैलानी आते रहते हैं. पिकनिक के दिन यहां श्रद्धालुओं की भीड़ बनी रहती है. पास में ही एक पेड़ है. जिसके बारे में किं वदंती है कि यहां ढ़ेला बांधने से मन की मांगी मुराद पूरा होती है. बशर्ते मुराद पूरी होने पर ढ़ेला खोला भी जाये.

फिल्टर पहाड़ रेलवे का जल श्रोत . काली पहाड़ी के निकट ही रेलवे का वाटर फिल्टर प्लांट है. जहां से रेल इंजन कारखाना सहित विभिन्न रेलवे कॉलोनियों में पेयजल आपूर्ति की जाती है. इसकी स्थापना 18 सौ 60 की दशक में अंगरेजों द्वारा की गयी थी. यूं तो यह क्षेत्र अनाधिकार प्रवेश वजिर्त है. किंतु आसपास की रमणीक छटाएं सैलानियों को वर्ष भर लुभाती है. यही कारण है कि यहां पहली जनवरी, बड़ा दिन के मौके पर तो लोग पिकनिक मनाने आते ही है. अक्सर यहां सैलानी या स्थानीय लोग परिवार समेत चंद लम्हे प्रकृति की गोद में बिताने पहुंच जाते है.

प्राकृतिक नहर लुभाती सैलानियों को . काली पहाड़ी की तराई में प्राकृतिक छटा समेटे दो नहर है. यहां जमालपुर वासी प्रति वर्ष छठ पूजा में अध्र्यदान करने पहुंचते हैं. नहर के पास से ही पहाड़ी पर चढ़ने का रास्ता शुरू होता है.

बदहाल हैं रास्ते, कठिन है डगर

सरकार की उदासीनता के कारण प्राचीन काली पहाड़ी अपनी रौनक खोती जा रही है. पूर्व में पत्थर उत्खनन से जुड़े लोगों ने जहां इसे नुकसान पहुंचाया वहीं वन संपदाओं की अंधाधुंध कटाई ने भी इसे क्षति पहुंचाया है. चढ़ाई के रास्ते खतरनाक हैं. बैरियर नहीं रहने के कारण असावधानी एक बड़ा खतरा हो सकता है. काली पहाड़ी के उपर भले ही एक पोखर है, किंतु उसके अलावा वहां पानी की कोई व्यवस्था नहीं है. सैलानी वहां पानी ले जाने पर मजबूर रहते हैं. पिकनिक पार्टी ने भी इस स्थल की सुंदरता को नुकसान पहुंचाया है. वे अपने साथ प्लास्टिक के थैले यहां तक तो लाते जरूर हैं पर उसे वहीं छोड़ जाते हैं. जिसके कारण वहां गंदगी भी व्याप्त हो चुकी है.

Prabhat Khabar Digital Desk
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