सनातन सिद्धांत से मानव का कल्याण संभव : शंकराचार्य

By Prabhat Khabar Digital Desk
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मुंगेर : पूरे विश्व का निर्माण एक मात्र सनातन धर्म से ही हुआ है. सनातन धर्म हर देश, काल और परिस्थिति में सभी व्यक्ति के लिए उपयोगी सिद्ध होता है. किसी भी देश, काल और परिस्थिति में इसकी उपयोगिता मानव के लिए लुप्त या क्षुब्ध नहीं होती. इस संसार में पृथ्वी, जल, वायु, आकाश, परम इंद्रियां, ज्ञानेंद्रियां, वेद, ग्रंथ सभी पुराना है. यहां तक की जीव भी पुराना है. जिनका अस्तित्व सदियों से इस संसार में रहा है. ये सभी एक रसायन है. जिनकी उपयोगिता पहले थी, आज है और आगे भी रहेगी.

इन पुराने रसायनों की उपयोगिता को छोड़ने से जीवन का उद‍्भव कभी संभव नहीं है. सनातन धर्म का सिद्धांत इन उपयोगिता को हमेशा जीवित रखना है. ये बातें गुरुवार को मंगल मूर्ति पैलेस में आयोजित सनातन धर्म सम्मेलन के दौरान पुरी पीठ के पीठाधीश 145 वें शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती महाराज ने कही.
उन्होंने कहा कि भारतवर्ष विश्व का हृदय है. जहां भगवान विभिन्न रूपों में अवतरित हुए हैं. उनके अस्तित्व व आदर्श की रक्षा से ही विश्व का कल्याण सुनिश्चित हो सकता है. आज कंप्यूटर, एटम और मोबाइल के युग में भी सनातन वैदिक आर्य मनीषियों द्वारा चिर परीक्षित सिद्धांतों का आलंबन लेकर हम लौकिक और पारलौकिक उत्कर्ष प्राप्त कर सकते हैं.
साथ ही परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग भी प्रशस्त कर सकते हैं. उन्होंने बताया कि श्रीमद् भागवत के चतुर्थ स्तंभ के 18वें अध्याय के तीसरे, चौथे और पांचवें श्लोक के माध्यम से एक अद‍्भुत तथ्य उद‍्भाषित किया गया है.
जिसमें भूदेवी ने गाय का रूप धारण कर महाराजा पृथु को प्रबोधित किया कि राजन यदि किसी को लौकिक उत्कर्ष अभीष्ठ हो, फिर भी उसकी बुद्धि इसी में समाहित है कि वह वैदिक मनीषियों द्वारा चिर परीक्षित व मानव कल्याण के लिए प्रयुक्त सिद्धांतों का आलंबन लें. क्योंकि बिना इन सिद्धांतों के भौतिक विद्या से भौतिक उत्कर्ष संभव नहीं है.
सनातन धर्म के सिद्धांतों द्वारा समाज को बेहतर बनाना ही गोवर्धन मठ का लक्ष्य रहा है. शंकराचार्य ने कहा कि कदाचित कोई प्रथा पुरानी हो, उसकी उपेक्षा की जा सकती है. लेकिन पुरातन काल से इस संसार में समाहित आकाश, वायु, जल, भूमि की उपेक्षा कर जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती.
धारण करना ही धर्म
उन्होंने कहा कि आजकल एक अजीब विडंबना बनी है कि लोग धार्मिक शब्द सुनकर ही चौंक जाते हैं. लोग प्राय: अपने आप को हिंदू कहने में गौरवान्वित अनुभव करते हैं. लेकिन वे यह भी कहते हैं कि हिंदू एक विचारधारा है, हमें धार्मिक न समझें. अगर किसी व्यक्ति को धार्मिक कह दिया जाये तो उसे वह अपना अपकर्ष समझता है.
धर्म के प्रति इस प्रकार की अनास्था कैसे उत्पन्न हुई आज हमें उसपर विचार करने की आवश्यकता है. गोस्वामी तुलसीदास ने एक विचित्र तथ्य उद‍्भाषित किया है कि कलयुग में मनुष्य धर्म फल का सुख तो लेना चाहता है. लेकिन उसकी सिद्धि उपाय के अधीन होती है.
इस तथ्य का ज्ञान न होने के कारण ही धर्म में उनकी आस्था नहीं होगी. धर्म को न अपनाने पर सुख की कल्पना भी नहीं की जा सकती. धर्म का एक स्वरूप है स्वत: सिद्ध है. मत्स्यपुराण, महाभारत के कर्ण पर्व, शांति पर्व में धर्म की विरूक्ति दी गई है. 'धारणार्थ धर्म:'. जिसका अर्थ होता है धारण करने के कारण ही धर्म को धर्म कहते हैं.
जिसमें जो धारक होता है वह उद्धारक भी होता है. यह समझने की आवश्यकता है. इस मौके पर मुंगेर विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ रणजीत वर्मा, प्राध्यापक डॉ प्रभात कुमार, आयोजन समिति के राजेश मिश्रा, प्रो. सुधीर कुमार, राजकुमार खेमका, अशोक पटेल, दिनेश चौधरी सहित बड़ी संख्या में गणमान्य लोग मौजूद थे.
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