चंपारण के किसानों के लिए कृषि वैज्ञानिकों का महामंत्र, बदलते मानसून और सूखे से निपटने का अचूक फॉर्मूला

Published by : Purushottam Kumar Updated At : 01 Jun 2026 11:25 AM

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केवीके पीपरा कोठी

Motihari News: कृषि विज्ञान केंद्र के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. अरविन्द कुमार सिंह ने धान की सीधी बुवाई (DSR) तकनीक को किसानों के लिए बेहद उपयोगी बताया. कम पानी, बिना बिचड़ा और कम लागत में बंपर पैदावार की वैज्ञानिक विधि और खरपतवार नियंत्रण के उपाय. जानिए खबर विस्तार से…

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 Motihari News: मानसून की लगातार होती देरी, अनियमित मानसूनी वर्षा और तेजी से बढ़ते जलवायु परिवर्तन के कारण पूर्वी चंपारण जिले में पारंपरिक तरीके से धान की समय पर रोपाई करना अब किसानों के लिए घाटे का सौदा साबित हो रहा है. ऐन वक्त पर मजदूरों की भारी किल्लत, डीजल की आसमान छूती कीमतें और पटवन के बढ़ते खर्च ने खेती की लागत को अत्यधिक महंगा कर दिया है. इस गंभीर कृषि संकट के बीच कृषि विज्ञान केंद्र पिपराकोठी के प्रमुख सह प्रधान वैज्ञानिक डॉ. अरविन्द कुमार सिंह ने जिले के किसानों को एक बेहतरीन और वैज्ञानिक समाधान दिया है. उन्होंने बताया कि उपयुक्त खेतों में धान की सीधी बुवाई (Direct Seeded Rice – DSR तकनीक) किसानों के लिए कम लागत, कम पानी और समय बचाने वाली सबसे व्यावहारिक और आधुनिक तकनीक साबित हो सकती है. इस अनूठी विधि में न तो नर्सरी यानी बिचड़ा तैयार करने का झंझट होता है और न ही पौध उखाड़ने और कीचड़ में रोपाई करने की आवश्यकता होती है, बल्कि बीज सीधे मुख्य खेत में बोया जाता है.

दो वैज्ञानिक विधियों से कर सकते हैं धान की सीधी बुआई

प्रधान वैज्ञानिक डॉ. अरविन्द कुमार सिंह ने बताया कि पूर्वी चंपारण की भौगोलिक स्थिति के अनुसार किसान मुख्य रूप से दो प्रकार से सीधी बुआई तकनीक को अपना सकते हैं. पहली विधि के तहत हल्का नमी बनाकर सूखी बुआई की जाती है, जिसमें सूखे या हल्की नमी वाले समतल खेत में सूखे बीज को आधुनिक कृषि यंत्रों जैसे जीरो-टिल ड्रिल, मल्टी-क्रॉप प्लांटर, राइस-व्हीट सीढर या सीड ड्रिल की मदद से कतारों में बोया जाता है. इस विधि में बीज को मात्र 1 से 1.5 सेंटीमीटर की गहराई पर ही डालना चाहिए और कतार से कतार की दूरी लगभग 20 सेंटीमीटर होनी चाहिए. इस सूखी बुवाई के लिए प्रति हेक्टेयर 25 से 30 किलोग्राम बीज पर्याप्त रहता है. दूसरी विधि में हल्का पानी में लेह यानी मसाह कर अंकुरित बुआई की जाती है, जिसमें पर्याप्त नमी या हल्के लेह किए गए खेत में अंकुरित बीजों को ड्रम सीडर या लाइन विधि से बोया जाता है. इसके लिए बुवाई से पहले बीजों को 24 घंटे तक पानी में भिगोकर और फिर अगले 24 घंटे तक जूट के बोरे में अंकुरित कर लेना चाहिए.

समतलीकरण और खरपतवार नियंत्रण है सबसे बड़ा आधार

डॉ. सिंह ने जोर देकर कहा कि सीधी बुआई की सफलता का सबसे महत्वपूर्ण आधार खेत का पूरी तरह समतलीकरण और सही समय पर खरपतवार नियंत्रण करना है. खेत असमतल होने पर ऊंचे स्थानों पर सूखापन रहेगा और निचले स्थानों पर जल-जमाव हो जाएगा, जिससे बीजों का अंकुरण बुरी तरह प्रभावित होगा. इसके अलावा इस विधि में रोपाई की तुलना में घास अधिक उगती है, इसलिए बुवाई के बाद पहले 25 से 30 दिनों तक खेत को खरपतवार मुक्त रखना अनिवार्य है.

रबी फसलों के लिए समय पर खाली होंगे खेत

मशीनीकरण और आधुनिक खेती के फायदों को गिनाते हुए प्रधान वैज्ञानिक ने कहा कि इस तकनीक से मजदूरों पर किसानों की निर्भरता पूरी तरह घट जाती है और बड़े रकबे में समय पर बुवाई संभव होती है. बिना पडलिंग यानी कदोआ किए खेती करने से मिट्टी की प्राकृतिक संरचना बनी रहती है, जल प्रवेश अच्छा होता है, जड़ों का विकास बेहतर होता है और मृदा स्वास्थ्य सुदृढ़ रहता है. फसल अवशेषों को जलाने के बजाय खेत में मिलाने या मल्च के रूप में उपयोग करने से मृदा कार्बन में वृद्धि होती है. इस विधि से धान की फसल पारंपरिक रोपाई की तुलना में काफी जल्दी पककर तैयार हो जाती है, जिससे खेत समय पर खाली हो जाते हैं और किसान रबी सीजन में गेहूँ, मक्का, मसूर, चना, सरसों और आलू जैसी फसलों की समय पर अगेती बुवाई कर दोगुना लाभ कमा सकते हैं. जिले में सीधी बुआई के लिए कम अवधि, अच्छी अंकुरण क्षमता और जलवायु-सहिष्णु किस्मों को ही प्राथमिकता देनी चाहिए.

भूमि की प्रकृति के अनुसार ही करें वैज्ञानिक प्रमाणित बीजों का चयन

कृषि विज्ञान केंद्र ने बदलते मौसम और देर से आने वाले मानसून को देखते हुए पूर्वी चंपारण के लिए सर्वश्रेष्ठ और जलवायु-सहिष्णु किस्मों की अनुशंसा की है. निचली भूमि के लिए राजश्री, राजेन्द्र मह्सूरी-1 तथा स्वर्णा सब-1 जैसी लंबी अवधि की किस्में सबसे उपयुक्त हैं, जिनकी बुवाई 25 मई से 10 जून के बीच की जानी चाहिए. मध्यम से ऊँची भूमि के लिए राजेन्द्र श्वेता, राजेन्द्र सरस्वती, स्वर्णा, सबौर हर्षित धान, सबौर अर्धजल तथा विभिन्न संकर यानी हाइब्रिड धान किस्में सीधी बुआई तकनीक के लिए सर्वश्रेष्ठ हैं, जिनकी बुवाई का उपयुक्त समय 10 जून से 25 जून तक निर्धारित है.

प्रधान वैज्ञानिक डॉ. अरविन्द कुमार सिंह ने अंत में विशेष सलाह देते हुए कहा कि निचली व अत्यधिक जल-जमाव वाले खेतों में सीधी बुवाई की तकनीक को बहुत सावधानी से अपनाएं या ऐसे खेतों में स्थानीय परिस्थिति के अनुसार पारंपरिक रोपाई अथवा जलभराव-सहिष्णु किस्मों का ही चयन करें, ताकि बदलते मानसून की परिस्थितियों में भी धान उत्पादन को लाभकारी और टिकाऊ बनाया जा सके.

मोतिहारी से सच्चिदानंद सत्यार्थी की रिपोर्ट

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