आजादी के बाद भी लागू है ब्रिटिश कानून
Edited by Prabhat Khabar Digital Desk
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शौच कर : शहरवासियों से हर माह लिया जाता है टैक्स, पर नहीं मिल रहीं पर्याप्त सुविधाएं देश से अंगरेजी हुकूमत भले ही समाप्त हो गयी है, पर अब भी नप क्षेत्र में अंगरेजी हुकूमत काल में लागू किया गया शौच कर बदस्तूर लागू है. आम जनता से शौच कर हर माह लिया जाता है, […]
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शौच कर : शहरवासियों से हर माह लिया जाता है टैक्स, पर नहीं मिल रहीं पर्याप्त सुविधाएं
देश से अंगरेजी हुकूमत भले ही समाप्त हो गयी है, पर अब भी नप क्षेत्र में अंगरेजी हुकूमत काल में लागू किया गया शौच कर बदस्तूर लागू है. आम जनता से शौच कर हर माह लिया जाता है, लेकिन इसके लिए कोई सुविधा नहीं दी जा रही है. सबसे आश्चर्य पहलू यह कि शौच कर क्यों लिया जाता है इससे खुद विभागीय अधिकारी भी अनभिज्ञ हैं, लेकिन शौच कर लेने में कोई कोताही नहीं बरतते. महीना लगा नहीं कि लोगों के पास शौच कर जमा करने का नोटिस पहुंच जाता है.
मधुबनी : कहने को तो अंगरेजी हुकूमत चली गयी, लेकिन उसके द्वारा बनाया गया कानून आज भी चल रहा है. जी हां, यह किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं. यह बयां कर रहा है. नगर परिषद का कानून. ब्रिटिश काल में 1876 में स्थापित मधुबनी नगर पालिका 2002 में नगर परिषद का दर्जा प्राप्त किया.
तब से लिया जा रहा होल्डिंग टैक्स में कोई बदलाव नहीं हुआ. हां, टैक्स में प्रत्येक साल जरूर कुछ न कुछ वृद्धि हुई है. होल्डिंग टैक्स में नगर वासियों से पांच तरह के टैक्स लिया जाता है. इनमें मकान कर, शौचालय कर, पानी कर, स्वास्थ्य शेष व शिक्षा शेष शामिल हैं.
नगर परिषद के आंकड़ों के मुताबिक शहर में 77 हजार की आबादी पर सिर्फ सार्वजनिक शौचालय है. वो भी इस तरह के रख रखाव में है कि वहां जाना लोग मुनासिब नहीं समझते हैं. अब सवाल खड़ा होता है कि शहर मुख्यालय सहित इतनी बड़ी आबादी में टैक्स भरने के बावजूद भी शौचालय की व्यवस्था नहीं हैं.
क्यों लिया जाता है कर
नगर पालिका अधिनियम के तहत शहर वासियों को होल्डिंग टैक्स लिया जाता है. इसमें शौचालय कर भी शामिल है. पहले कमाऊ शौचालय की परंपरा थी. जिसे प्रत्येक दिन सफाई करवाना पड़ता था. इसके लिए नगर निकायों में सफाई कर्मी बहाल होते थे. शौचालय कर से इन्हें पारिश्रमिक दिये जाते थे.
2008 में हुआ था निर्णय
नगर परिषद बोर्ड की बैठक लिए गये निर्णय के आलोक में शहर में शौचालय निर्माण के लिए प्रस्ताव पारित किया गया. इसके आलोक में निविदा की प्रक्रिया भी हुई. समाधान नामक स्वयंसेवी संस्था को शौचालय निर्माण के लिए दिया गया, लेकिन निर्माण शुरू करने से पहले निविदा स्थगित कर दी गयी. पुन: एक दूसरे स्वयंसेवी संस्था को यह जिम्मा दिया गया, लेकिन मामला उच्च न्यायालय तक चला गया. मामला जो भी हो इसमें सीधे तौर पर जनता ठगा महसूस कर रही है.
नौ लाख मिले टैक्स
शहर वासियों से लिया जाने वाला होल्डिंग टैक्स में वित्तीय वर्ष 2014-15 में 43 लाख 61 हजार की वसूली हुई. इसमें 8,72200 रुपये शौच कर का भी शामिल हैं.
2004 में लगी रोक
सर्वोच्च न्यायालय के 2004 में आये आदेश के आलोक में मैला ढोने की प्रथा पर रोक लगी थी. उसके बाद कमाऊ शौचालय बंद कर दी गयी. शहरी क्षेत्र में 2010 में पूर्णत: बंद कर दी गयी. वहीं, इस नगर निकाय क्षेत्र 2011 से बंद कर दी गयी.
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