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दौरम शाह : मधेपुरा की पहचान, लेकिन उपेक्षा की मार

Updated at : 21 Sep 2025 7:07 PM (IST)
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दौरम शाह : मधेपुरा की पहचान, लेकिन उपेक्षा की मार

ओयनवार शासक को मधेपुरा क्षेत्र की देखभाल का जिम्मा सौंप रखा था.

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दौरम शाह से जुड़ी दास्तान : मधेपुरा का इतिहास, दरगाह और सांस्कृतिक धरोहर – – प्रभात खास- कुमार आशीष, मधेपुरा मधेपुरा की पहचान केवल एक विश्वविद्यालय, शिक्षा और राजनीति की धरती भर नहीं है. इस शहर का इतिहास सदियों पुराना है, जिसकी गवाही आज भी यहां बिखरे अवशेष, लोककथाएं और धार्मिक स्थल देते हैं. भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक डॉ श्रीमंत जैनेन्द्र ने हाल में अपनी खोज और विभिन्न विद्वानों के विचारों के आधार पर ‘दौरम शाह’ और मधेपुरा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर दिलचस्प तथ्य साझा किए. – 1353 ईस्वी से शुरू होती है दास्तान – डॉ. जैनेन्द्र बताते हैं कि 1353 ई. के आसपास दिल्ली के शासक फिरोजशाह तुगलक ने ओयनवार शासक को मधेपुरा क्षेत्र की देखभाल का जिम्मा सौंप रखा था. सेन व कर्नाट शासकों से उपजे विवाद को शांत कराने के लिए उन्होंने एक सेना टुकड़ी के साथ सूफी संत दौरम शाह मुस्तकीम को यहां भेजा. सेनाओं ने स्थिति संभालने के बाद वापसी की तैयारी की, पर दौरम शाह को यहां की हरियाली और वातावरण इतना भा गया कि उन्होंने लौटने से इनकार कर दिया और गौशाला के उत्तर संत अवध कॉलेज परिसर के पास कुटिया बनाकर रहने लगे. अपने सद्व्यवहार और मिलनसार स्वभाव से वे हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों में लोकप्रिय हो गए. उनकी कुटिया ‘दौरमा डीह’ के नाम से जानी जाने लगी. – रेल के साथ जुड़ा नाम ‘दौरम मधेपुरा’- वर्ष 1910 में मधेपुरा में रेल आई. लेकिन रेलवे रिकॉर्ड में अक्सर ‘मधुपुर’ और ‘मधेपुर’ की गड़बड़ी होती रही. स्थानीय लोगों ने सुझाव दिया कि स्टेशन का नाम संत दौरम शाह के नाम पर रखा जाए, क्योंकि तब तक वे मधेपुरा की पहचान बन चुके थे. रेलवे ने इसे स्वीकार किया और स्टेशन का नाम पड़ा ‘दौरम मधेपुरा’. – दौरम शाह की मजार की खोज – दौरम शाह की जयंती हाल के वर्षों में मनाई जाने लगी है. उनकी कोई तस्वीर उपलब्ध नहीं होने के कारण लोग बाबा फरीद की तस्वीर का प्रयोग करते हैं. परंतु सवाल यह था कि उनकी असली मजार कहां है. डॉ. जैनेन्द्र, प्रो. मो. अबुल फ़ज़ल और डॉ. विभीषण ने एक दिन मजार की खोज का निश्चय किया. स्थानीय प्रो. नरेश कुमार, प्रो. विनय कुमार चौधरी और डॉ. फिरोज मंसूरी ने जानकारी दी कि मजार इस्लामपुर के पास, दौरमा डीह के समीप बहने वाली नदी के उस पार है. यात्रा की शुरुआत कॉलेज चौक से हुई. बेलहा घाट का पुल पार करने के बाद दल इस्लामपुर पहुंचा. वहां से पैदल खेतों और नहर किनारे लगभग दो किलोमीटर का सफर तय कर एक सामुदायिक भवन के पास पहुंचा. यही भवन दरगाह के समीप स्थित था. – दरगाह का स्वरूप और मान्यताएं- दरगाह पक्के चबूतरे पर बनी है, चारों ओर लोहे की ग्रिल से घिरी हुई. चबूतरे पर रंग-बिरंगी चादरें चढ़ी थीं और समीप पाखैर के पेड़ की शाखाओं पर कपड़े बंधे थे. स्थानीय लोगों में इस दरगाह को लेकर कई नाम प्रचलित हैं. कोई इसे ‘पीर बाबा’, कोई ‘गुमान शाह’ और कोई ‘मस्तान काला बाबा’ की मजार कहते है. बातचीत में नारायण साह नामक बुजुर्ग ने बताया कि यह दरगाह उनकी जमीन पर है और उन्होंने ही इसके चारों ओर चबूतरा बनवाया. उन्होंने अपने पूर्वजों से सुना था कि बाढ़ में दरगाह बह गई थी और बाद में अनुमान से पुनः स्थापित की गई. इसलिए इसका मूल स्थान आज का स्थान नहीं है. – नदी और बाढ़ का असर- मधेपुरा के पूरब से बहने वाली चिलौनी नदी के कारण यह क्षेत्र बार-बार बाढ़ से प्रभावित होता रहा. हवलदार त्रिपाठी की किताब ‘बिहार की नदियां’ के अनुसार 1920-30 के दशक तक कोसी की एक धारा इसी चिलौनी नदी होकर बहती थी. इससे दरगाह का स्थान भी समय-समय पर बदला. – स्थानीय योगदान- बाद में बीएनएमयू के प्रो-वीसी रहे प्रो फारूक अली ने दरगाह के चारों ओर ग्रिल लगवायी. वहीं, झिटकिया पंचायत की मुखिया चांदनी खातून के पति परवेज आलम ने सामुदायिक भवन बनवाया. यह क्षेत्र भौगोलिक दृष्टि से काफी चुनौतीपूर्ण है. चिलौनी नदी गांव को दो हिस्सों में बांट देती है. पश्चिमी भाग तो मधेपुरा और सिंहेश्वर से जुड़ा है, पर पूर्वी भाग अब भी कटाव और आवागमन की समस्या झेल रहा है. – लोककथाएं और किस्से – लोगों के बीच मस्तान काला बाबा की भी कहानियां चलती हैं, जिन्होंने कभी इस एकांत जंगल को अपना ठिकाना बनाया. कहा जाता है कि उन्होंने स्थानीय लोगों को अपने प्रभाव में ले लिया था और यहां तक कि तत्कालीन डीएम ने भी उन्हें धन दिया था. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार हर गुरुवार को यहां खस्सी और मुर्गे की बलि दी जाती है. लोग अपनी मनोकामना पूरी होने पर चादर चढ़ाते हैं. कई लोकगाथाओं (‘भगैत’) में भी इस दरगाह का उल्लेख आता है. – पुल की जरुरत और भविष्य की संभावनाएं- स्थानीय लोग मानते हैं कि यदि संत अवध कॉलेज के पास नदी पर पुल बना दिया जाए, तो दरगाह तक पहुंचना आसान हो जाएगा और गांव का सीधा संपर्क मधेपुरा शहर से हो जाएगा. इससे दरगाह का सांस्कृतिक महत्व भी और बढ़ेगा. एक बुजुर्ग किसान ने पुल निर्माण को लेकर सवाल पूछने पर व्यंग्य मिश्रित मुस्कान के साथ कहा कि “पुल आएल रहे, लेकिन चैल गएले.” – मधेपुरा की धरोहर हैं दौरम शाह- दौरम शाह की यह दास्तान केवल एक सूफी संत की याद नहीं है, बल्कि मधेपुरा की सांस्कृतिक धरोहर और सामाजिक समरसता का प्रतीक है. आज भी यह स्थल न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि अतीत से जुड़ने का जीवंत माध्यम भी. जरूरत है कि इसे संरक्षित और विकसित किया जाए ताकि आने वाली पीढ़ियां भी मधेपुरा की इस ऐतिहासिक पहचान से परिचित हो सकें.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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Kumar Ashish

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Kumar Ashish is a contributor at Prabhat Khabar.

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