मधेपुरा में ‘फ्यूल क्राइसिस’: चूल्हों से गायब हुई नीली लौ, धुएं में घुटती रोजी-रोटी

गैस एजेंसियां 25 दिनों के बाद दूसरा सिलेंडर बुक करने की बात कहती है
सरकार व प्रशासन के सारे दावे हो रहे फेल, 25 दिनों की निर्धारित अवधि में नहीं हो रही रिफिलिंग
-व्यवसायिक सिलिंडर नहीं मिलने से रेस्टोरेंट समेत छोटे-बड़े व्यवसाय हो रहे प्रभावित-रेस्टोरेंट में भोजन समेत मिठाई, चाट-समोसा, स्नैक्स, पानीपुरी तक हुई महंगी
-कई दुकानों का शटर हुआ डाउन, रोजी-रोटी पर आफतअमन श्रीवास्तव, मधेपुरासरकार और प्रशासन गैस की आपूर्ति के सामान्य होने के चाहे लाख दावे कर रहा हो, लेकिन मधेपुरा इन दिनों गंभीर गैस संकट की चपेट में है. गैस गोदामों पर अहले सुबह से लंबी-लंबी कतारें लग रही हैं, लेकिन वहां भी यह निश्चित नहीं है कि उन उपभोक्ताओं को गैस सिलिंडर मिल ही जाये. एलपीजी की भारी किल्लत ने न केवल घरों का बजट बिगाड़ दिया है, बल्कि शहर की लाइफलाइन माने जाने वाले छोटे ढाबों, रेहड़ी-पटरी विक्रेताओं और दिहाड़ी मजदूरों के अस्तित्व पर संकट खड़ा कर दिया है. आलम यह है कि आधुनिक रसोई से सिलिंडर गायब हो रहे हैं और उनकी जगह कोयले व लकड़ी के चूल्हों ने ले ली है.
25 दिनों के बाद बुक नहीं हो रहा दूसरा सिलिंडर
बाजार में मांग और आपूर्ति का संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका है. पुरानी बस स्टैंड पर ढाबा चलाने वाले दुकानदारों का कहना है कि गैस एजेंसियां 25 दिनों के बाद दूसरा सिलिंडर बुक करने की बात कहती है, लेकिन 25वें, 26वें या 27वें दिन तक कॉल नहीं लगता है. उसके बाद यदि कॉल लगता भी है, तो मैसेज आता है कि आठ घंटे के अंदर आपको कंफर्म किया जायेगा, लेकिन अगले पांच-छह दिनों तक न तो दूसरा कोई मैसेज आता है और न ही डीएसी नंबर की सूचना दी जाती है. जब एजेंसी को यह मैसेज दिखाया जाता है तो वहां बताया जाता है कि आपका गैस बुक नहीं हुआ है. दो-चार दिनें के बाद फिर प्रयास करें. मतलब दूसरा सिलिंडर लेने के लिए 25 नहीं 35 से 40 दिनों का वक्त लग रहा है. फिर भी मिलना सुनिश्चित नहीं होता है.
कालाबाजारी करने वालों को कैसे मिल रहा सिलिंडर
इधर कालाबाजारी करने वाले एक सिलिंडर के लिए 2000 से 3000 रुपये तक वसूल रहे हैं. छोटे कारोबारियों के लिए इतनी कीमत पर गैस सिलिंडर खरीदना घाटे का सौदा साबित हो रहा है, क्योंकि खाने की कीमतें बढ़ाने पर ग्राहकों के टूटने का डर है. ऐसी स्थिति में कई दुकानों के शटर डाउन हो चुके हैं. उनके समक्ष रोजी-रोटी का संकट गहरा गया है. हालांकि कई रेस्टोरेंट और मिठाई की दुकानों समेत छोटी दुकानें अब भी संचालित हो रही हैं, लेकिन वहां दरों में अप्रत्याशित वृद्धि कर दी गयी है. पहुंचने वाले कस्टमर की संख्या आधे से भी कम हो गयी है.लॉज में रहने वाले छात्रों का हुआ पलायन
मधेपुरा शहर उच्च शिक्षा पाने वाले छात्रों का लंबे समय से ठिकाना रहा है. यहां की आर्थिक व्यवस्था छात्रों के लिए संचालित लॉज पर भी निर्भर है. जहां छात्र छोटे सिलिंडर में गैस भरवा खाने बनाते रहे हैं. लेकिन दो माह से चल रहे संकट से वे अपने छोटे सिलिंडर में गैस रिफिल नहीं करा पा रहे हैं. पहले जहां 90 रुपये प्रतिकिलो की दर से वे गैस रिफिल कराते थे, वहीं संकट शुरू होने के बाद इसकी दर दोगुनी से भी अधिक 200 रुपये प्रतिकलो हो गयी, लेकिन कुछ दिनों के बाद रिफिलिंग भी बंद हो गयी है. लकड़ी अथवा कोयले के चूल्हे पर वे खाना बना नहीं सकते, लिहाजा वे शहर छोड़ अपने गांव की ओर पलायन कर गये.धुआं, बीमारी और घटती कमाई: छोटे दुकानदारों की व्यथा
कॉलेज चौक और सदर अस्पताल क्षेत्र के दुकानदारों ने अपना दर्द साझा करते हुए बताया कि लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनने में समय अधिक लगता है, जिससे ग्राहक इंतजार करने के बजाय दूसरे विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं. लगातार धुएं और चूल्हे की गर्मी के बीच काम करने से संचालकों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है. आय में गिरावट से बिरयानी और फास्ट फूड बेचने वाले दुकानदारों की कमाई आधी रह गयी है.मेडिकल कॉलेज तक पहुंची आंच, जीविका दीदी की कैंटीन प्रभावित
गैस संकट का असर जननायक कर्पूरी ठाकुर मेडिकल कॉलेज तक जा पहुंचा है. यहां संचालित जीविका दीदी की कैंटीन में समोसा-पकौड़ी जैसे स्नैक्स को बनाना बंद कर दिया गया है. जरूरी भोजन को किसी तरह कोयले के चूल्हे पर बनाया जा रहा है, जिससे मरीजों और उनके तीमारदारों को भी असुविधा हो रही है.मजदूरों और निम्न आय वर्ग वालों पर दोहरी मार
झुग्गी बस्तियों में रहने वाले रिक्शा चालक व दिहाड़ी मजदूर, जो छोटे सिलिंडरों पर निर्भर थे, सबसे ज्यादा परेशान हैं. रिफिलिंग वाली दुकानें बंद होने के कारण वे होटलों में महंगा खाना खाने को मजबूर हैं. उनकी सीमित आय अब केवल भोजन के इंतजाम में ही खत्म हो जा रही है.– पीएनजी कनेक्शन वालों को राहत, लेकिन कवरेज अभी भी कम
शहर के जिन वार्डों में पाइपलाइन वाली गैस पहुंच चुकी है, वहां बड़े होटलों और घरों को थोड़ी राहत जरूर है. उनके मीनू और रूटीन में बदलाव नहीं आया है. हालांकि, शहर के कई वार्डों में अभी भी पीएनजी का बुनियादी ढांचा तैयार नहीं है. इसके कारण वहां के निवासी पूरी तरह एलपीजी की अनिश्चित आपूर्ति पर निर्भर हैं.प्रशासन का दावा बनाम धरातल की हकीकत
एक तरफ जिला प्रशासन जिले में गैस की कमी नहीं होने का दावा कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ गैस एजेंसियों के बाहर लगी लंबी कतारें और केवाईसी के लिए जूझते उपभोक्ता कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं. सिंघेश्वर स्थित इंडेन गैस एजेंसी और मुख्यालय की मेसर्स योगेंद्र गैस एजेंसी पर उमड़ रही भीड़ इस संकट की गंभीरता को दिखा रही है.-बॉक्स में-
निर्धारित 45वें दिन बुक नहीं कराया, तो हो गया लेप्स
उदाकिशुनगंज स्थित एचपी एजेंसी की अलग ही कहानी सामने आयी है. जहां निर्धारित 45वें दिन सिलिंडर बुक नहीं कराने पर उपभोक्ताओं की रिफिलिंग लेप्स कर दिया गया. एजेंसी के कंज्यूमर पूनम देवी, चंदन कुमार सहित अन्य ने बताया कि उदाकिशुनगंज से बाहर चले जाने के कारण वे निर्धारित 45वें दिन अगला रिफिल बुक नहीं करा सके. वहां से आने के बाद जब बुक कराने का प्रयास किया, तो कोई रेस्पांस नहीं मिला. एजेंसी कार्यालय से संपर्क करने पर बताया गया कि समय से बुक नहीं कराने के कारण उनका बुकिंग लेप्स कर गया. अब वे फिर अगले 45वें दिन ही बुक करा सकेंगे.प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
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