आस्था का महापर्व छठ, एक ही घाट... जल सबका व सुरुजदेव भी सबके

Published at :06 Nov 2016 4:16 AM (IST)
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आस्था का महापर्व छठ, एक ही घाट... जल सबका व सुरुजदेव भी सबके

मधेपुरा : आज महापर्व छठ है. नदी और तालाब के घाट सजाये जा रहे हैं. सब मिल कर तैयारी कर रहे हैं. सबके घाट एक से ही. धरा सबकी… जल सबका और सूर्य देव भी. सब एक समान. घाट पर गरीब और अमीर का भेद नहीं है. सबके सूप के प्रसाद की महत्ता एक समान. […]

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मधेपुरा : आज महापर्व छठ है. नदी और तालाब के घाट सजाये जा रहे हैं. सब मिल कर तैयारी कर रहे हैं. सबके घाट एक से ही. धरा सबकी… जल सबका और सूर्य देव भी. सब एक समान. घाट पर गरीब और अमीर का भेद नहीं है. सबके सूप के प्रसाद की महत्ता एक समान. छठी मइया के सब संतान. यह बाजार का पर्व नहीं…

लोक पर्व है! आमजन की आस्था की जड़ें इतनी गहरी हैं कि दिल्ली सहित पूरे भारत और विदेश से परदेसी बाबूओं का पिछले तीन दिनों से लगातार आना जारी है. सभी ट्रेनें भरी हैं. बस, टेंपो, टैक्सी सब के सब खचाखच भरे हुए. हवाई जहाज को भी फुरसत नहीं. सुबह तीन बजे से ही भारी भरकम बैग और सूटकेस कंधे पर उठाये लोग अपने गांव की ओर भागे जा रहे हैं. कौन अमीर और कौन गरीब. उनमें सुबह की प्रतीक्षा का सब्र नहीं. कुछ परिवार के लोग उदास हैं कि ट्रेन में टिकट नहीं मिलने के कारण उनके परिजन नहीं आ रहे. उन्हें अब दिल्ली में ही छठ करना होगा.

बेहद सादगी से भरे लोक आस्था के इस महान पर्व को धर्म के नजरिये से देखें या आस्था के पहलु से, इसमें उतनी ही विशालता नजर आती है. भारत की सम्यक परंपरा की सच्ची और जीती जागती तसवीर है यह छठ पर्व. न आडंबर, न पैसा और न स्टेटस. छठ घाट पर सब बराबर. पिछले कई दिनों से बाजार में खरीदारी के लिए भीड़ उमड़ी पड़ी है. भारत का यह एक मात्र महापर्व है जहां बाजार गौण है. बाजार में भीड़ ही भीड़ है लेकिन खरीदना क्या है लोगों को, कंद और मूल. छठ पर्व में प्रसाद तैयार करने में कुछ आटा, चीनी और तेल के अतिरिक्त ऐसी वनस्पतियों का इस्तेमाल होता है
जो बस इस पर्व के दरम्यान ही कीमती हो उठती हैं. कंद – मूल में अदरक, हल्दी, सुथनी, अल्हुआ, मूली है. इसके अलावा नारियल, ईंख और कुछ फल बस यही मुख्य खरीदारी है छठ पर्व की. दो महीने से बांस के शिल्पकार कहे जाने वाली मरीक जाति के लोग सूप तैयार कर रहे थे. दउरा बनाया जा रहा था. इस महापर्व की महत्ता तो देखये सौदागर वे हैं
जो समाज के अंतिम पायदान पर खड़े हैं. बाजार में यही खरीदने को भीड़ है. पंजाब में मजदूरी कर लौटा सिंहेश्वर का बिजेंद्र भी यही खरीद रहा है और शहर के प्रमुख व्यवसायी में शुमार होने वाले इंद्रदेव स्वर्णकार को भी इसी की दरकार है. वाह छठ मइया! जय हो, आपकी महिमा अपरंपार!
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