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मधेपुरा : तेरा साथ है कितना प्यारा, कम लगता है जीवन सारा… कुछ इसी अंदाज-ए-बयां में वेलेंटाइन वीक का समापन कोसी के इलाके में देखने को मिला. रविवार को वेलेंटाइन डे के मौके पर शहर में गिफ्ट आइटम के साथ-साथ फूलों की डिमांड भी काफी बढ़ गयी. सुबह तक दुकान में दर्जनों की संख्या में […]

मधेपुरा : तेरा साथ है कितना प्यारा, कम लगता है जीवन सारा… कुछ इसी अंदाज-ए-बयां में वेलेंटाइन वीक का समापन कोसी के इलाके में देखने को मिला. रविवार को वेलेंटाइन डे के मौके पर शहर में गिफ्ट आइटम के साथ-साथ फूलों की डिमांड भी काफी बढ़ गयी. सुबह तक दुकान में दर्जनों की संख्या में नजर आने वाले गुलाब शाम तक ढूंढने से भी नहीं मिला. अपने वेलेंटाइन के लिे गुलाब ढूंढने आया गंगजला का राकेश कहता है कि साल में एक दिन आता है,

जब आप अपने दिल के करीब रहने वाले व्यक्ति से अपनी भावनाओं का खुल कर इजहार कर सकते हैं. आप उसे इसका अहसास करा सकते हैं कि उनका साथ कितना प्यारा लगता है. भले ही महानगरों में यंगस्टर्स की भीड़ हर जगह नजर आ रही हो, लेकिन छोटे शहरों में भी मोहब्बत करने वालों की संख्या कम नहीं है.

स्थानीय मंदिर सहित अन्य जगहों पर पहले की अपेक्षा अब काफी अधिक संख्या में हाथों में हाथ डाले युवा जोड़े दिख जाते हैं, जो दुनियां से बेफिक्र अपने चाहने वाले के कंधे पर सर रखकर आने वाले कल को अपना बनाने का ख्वाब बुन चुके हैं. ज्ञात हो कि रोज डे, प्रपोज डे, प्रॉमिस डे, चॉकलेट डे व किस डे के बाद वेलेंटाइन डे का उत्साह व उमंग न्यू जेनेरेशन पर छाया रहा.

प्रेम का अनूठा पर्व
भारतीय संस्कृति में आपसी प्रेम को परिभाषित करने के लिए कई प्रकार के पर्व ऐतिहासिक काल से ही अस्तित्व में हैं. खासकर रक्षा बंधन, करवा चौथ, भातृ द्वितीया, मधुश्रावणी, वट सावित्री, बाल दिवस, शिक्षक दिवस जैसे पर्व हैं. जिनमें पति-पत्नी, भाई-बहन व गुरु- शिष्य परंपरा को लेकर समर्पण का भाव उमड़ कर सामने आता है. बीते दशकों की बात करें तो ग्लोबलाइजेशन की वजह से विदेशी मुल्कों से शुरू हुए वेलेंटाइन डे की पहुंच गांव व कस्बों तक हो गयी है.
मिथिलांचल में हो रहा असर
सेंट वेलेंटाइन का संदेश पाश्चात्य देशों सहित देश के मेट्रो सिटी में पूर्व से ही लोकप्रिय रहा है, लेकिन वर्तमान में प्यार के इस पर्व ने मिथिलांचल को भी अपनी जद में ले लिया है. बाजारवाद के प्रभाव ने अन्य उत्सवों की तरह वेलेंटाइन डे को भी निशाना बनाना शुरू कर दिया है. हालांकि इस ओर युवा पीढ़ी सहजता से आकर्षित भी हो रही है. वेलेंटाइन डे की परिकल्पना आपसी भाइचारे,
सामाजिक सौहार्द व पारिवारिक संस्कारों के ईद-गिर्द ही बुनी गयी थी. लेकिन कालांतर में प्यार जताने का यह खास दिन लड़का व लड़कियों के आकर्षण सहित सिल्वर स्क्रीन पर ही सिमट कर रह गया था. जो आने वाले समय में हिंदुस्तानी कल्चर के अनुरूप वेलेंटाइन डे के उद्देश्य को भी सार्थकता प्रदान करेगी.
ज्ञात हो कि कलांतर में जनक नंदनी सीता ने भरी सभा में भगवान श्रीराम को स्वयंवर में अपना जीवन साथी बना प्रेम की अनुठी परंपरा की नींव रखी थी. शहर के रेस्टूरेंट व मंदिरों में न्यू कपल के अलावा शादी शुदा लोग भी दिन को यादगार बनाने के लिए जमा हुए थे.
सभ्यता व संस्कृति रही कायम
वेलेंटाइल डे मनाने का उत्साह भले ही चरम पर था. लेकिन कोसी की सभ्यता व संस्कृति को संभालने व उसे अक्षुण्ण रखने का बीड़ा भी इन युवाओं ने बखूबी उठाया. मत्स्यगंधा परिसर में दिन भर युवाओं का जोड़ा आता रहा, भले ही छिप छिपा कर ही सही, लेकिन मर्यादाओं की सीमाओं के साथ. सुपौल से आये सुमित व सुमिता ने बताया कि दोनों की सगाई हो चुकी है. ऐसे में घरवालों को भी साथ में कहीं आने-जाने में ऐतराज नहीं है.
लेकिन प्रेम के इस पावन दिन को हमलोगों ने यादगार बनाने के लिए वेलेंटाइन डे को चुना. जहां आप भगवान के समक्ष अपने प्रेम को स्वीकार कर सकते हैं. सुमिता बताती है कि हालांकि इस दिन एक दूसरे को गिफ्ट देने का चलन काफी अच्छा है. इससे पता चलता है कि वह आपका कितना ख्याल रखता है. पश्चिमी सभ्यता से प्रेरित होकर भले ही यह रिवाज की तरह युवाओं को खींच रहा है. लेकिन यहां के युवाओं ने इसे भी अपने रूप में ढ़ाल कर व अपना कर कोसी की सभ्यता व संस्कृति को नुकसान नहीं होने दिया है.
Prabhat Khabar Digital Desk
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