दूध के लिए तरस रहे हैं अनुमंडल के लोग

Published at :26 Dec 2015 2:39 AM (IST)
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दूध के लिए तरस रहे हैं अनुमंडल के लोग

– लोग दूध पाउडर के बनाये चाय का सेवन करने पर मजबूर हो गये उदाकिशुनंज : अनुमंडल मुख्यालय स्थित तीन वर्ष से संचालित दूधशीतक से यहां के पशुपालकों को लाभ तो हो रहा है , लेकिन यहां के लोगों को आवश्यकता अनुसार दूध नहीं मिल पा रहा है. चूंकि दूध ढंडा करने के बाद पैकिंग […]

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– लोग दूध पाउडर के बनाये चाय का सेवन करने पर मजबूर हो गये
उदाकिशुनंज : अनुमंडल मुख्यालय स्थित तीन वर्ष से संचालित दूधशीतक से यहां के पशुपालकों को लाभ तो हो रहा है , लेकिन यहां के लोगों को आवश्यकता अनुसार दूध नहीं मिल पा रहा है. चूंकि दूध ढंडा करने के बाद पैकिंग की व्यवस्था यहां नहीं रहने के कारण पूर्णिया भेज दिया जाता है.
क्या है क्षमता. सुधा डेयरी ने 50 लाख रुपये की लागत से पांच – पांच हजार लीटर दूध को ठंडा करने के लिए दो प्लांट लगाया है. लेकिन, दूध ठंडा करने के बाद पैकिंग कर बाजार में उतारने की व्यवस्था नहीं की जा सकी है. जिस वजह से दूध ठंडा करने के बाद पूर्णिया स्थित प्लांट को भेज दिया जाता है. जहां पैकिंग कर दूध को वहीं के बाजार में बेच दिया जाता है. कोसी व पूर्णिया प्रमंडल के सभी सात जिलों को मिला कर कोसी डेयरी प्रोजेक्ट बनाया गया है.
यहीं कारण है कि अनुमंडल में दूध की कमी हो रही है. फलस्वरूप लोगों को आवश्यकता अनुसार दूध नहीं मिल पा रहा है. चाय के लिए भी दूध नहीं मिल पा रहा है. ऐसी स्थिति में लोग सागर दूध पाउडर के बनाये चाय का सेवन करने पर मजबूर हो गये. पर्व त्योहार, शादी या श्राद्ध क्रम के लिए अन्य जगहों से महंगा दूध मंगवाने को मजबूर हो चुके है.
कितना संग्रह किया जाता है दूध
सुधा डेयरी के सुपरवाइजर सुमन कुमार सुमन ने बताया कि वर्तमान में पशुपालकों से नौ हजार लीटर दूध संग्रह किया जा रहा है. हालांकि दस हजार लीटर दूध कुछ दिन पहले तक संग्रह किया जाता था. समझा सकता है कि जबकि इतनी बड़ी मात्रा में दूध दूसरे जिले को भेज दिया जाता हो तो यहां के लोगों को दूध के लिए तरस जाना स्वाभाविक ही है.
अगर पैकिंग की हो जाती व्यवस्था
दूध ठंडा करने के बाद अगर पैकिंग मशीन यहां लगा दिया जाता तो स्थानीय लोगों को दूध की कमी नहीं होती. लेकिन भविष्य में भी इससे आसार नहीं लग रहे है. चूंकि मधेपुरा सहरसा सुपौल जिले को मिला कर कोसी मिल्क यूनियन बन चुका है. जिसका मुख्यालय सुपौल में होगा.
इस तरह निकट भविष्य में दूध पैकिंग की व्यवस्था सुपौल में की जायेगी. इस तरह यहां के लोगों को दूध की कमी सब दिन रह जायेगी. लेकिन दूध का सेवन कर खुद और बच्चों को मजबूत बनाते लेकिन ऐसा नहीं हो पायेगा. दूध का सेवन अब वहीं कर पायेंगे. जो दुधारू पशु पालेंगे. अन्यथा दूध के लाले पड़ते ही रहेंगे.
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