बढ़ते गये विभाग, कम होती गयीं सुविधाएं, गैराज में डाक घर, तो एक चापाकल पर हजारों की जिम्मेदारी
Updated at : 08 May 2019 6:52 AM (IST)
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आशीष श्रीवास्तव, मधेपुरा : नौ मई 1981 को समाहरणालय की स्थापना स्थानीय आबादी व जनमानस की सुविधा को ध्यान में रख कर की गयी थी. समय के साथ सरकारी महकमे का आकार व सरकारी कार्यालय में काम करने वाले मुलाजिम व उनके अधिकारियों की संख्या भी बढ़ती गयी. इन विभागों में सरकार द्वारा शुरू किये […]
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आशीष श्रीवास्तव, मधेपुरा : नौ मई 1981 को समाहरणालय की स्थापना स्थानीय आबादी व जनमानस की सुविधा को ध्यान में रख कर की गयी थी. समय के साथ सरकारी महकमे का आकार व सरकारी कार्यालय में काम करने वाले मुलाजिम व उनके अधिकारियों की संख्या भी बढ़ती गयी.
इन विभागों में सरकार द्वारा शुरू किये गये जन कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन व लोक सेवा अधिकार के प्रति जागरूकता ने समाहरणालय में जनता मालिक की आवाजाही भी बढ़ा दी है.
जाहिर सी बात है कि लोगों की संख्या बढ़ने से जन सुविधा की जरूरत भी होने लगी. ऐसे में आधारभूत संरचना का विस्तार नहीं होने से लोगों को खामियाजा भुगतना पड़ रहा है. गौर करने वाली बात है कि परिसर में साहब लोगों के लिए कमोबेश व्यवस्था बनी हुई है, लेकिन आमजनों के लिए शौचालय, स्वच्छ जल, कॉमन रूम की समस्या अब भी जस की तस बनी हुई है.
आवश्यक काम से पहुंचने वाले लोग बैठने के लिए माकूल जगह नहीं मिलने पर आसपास के फूटपाथ दुकानों व वृक्षों की छांव में समय बिताते रहते है. जानकारी के अनुसार इस परिसर में रोजाना तीन से चार हजार लोगों की आवाजाही सुबह से शाम तक बनी रहती है. इसके बावजूद प्रशासनिक अमला बेखबर बनी हुई है. प्रस्तुत है प्रभात खबर द्वारा सोमवार को की गयी पड़ताल.
एक अदद चापाकल बुझा रही हजारों की प्यास : समाहरणालय में पदस्थापित बड़े साहब के लिए आरओ वॉटर की व्यवस्था कर दी गयी है, लेकिन आम लोगों की निर्भरता परिसर में परिवहन विभाग के सामने लगी एक चापाकल पर बनी हुई है. ज्ञात हो कि रोजाना हजारों की तादाद में पहुंचने वाले लोगों को पेयजल के लिए चापाकल पर निर्भर रहना पड़ता है.
समाहरणालय के भूतल पर लगभग 55 से 60 लिपिक संवर्ग एवं 25 से 30 के बीच चतुर्थवर्गीय कर्मचारियों सहित तीन से चार हजार आम आदमी के लिए पेयजल के नाम पर एक चापाकल की व्यवस्था है, जबकि दूसरे व तीसरे तले पर आरओ की व्यवस्था का फायदा हाकिम ले रहे है.
लोग ढूंढते रहते है शौचालय, बाबू करते है उपयोग : सरकार का सात निश्चय गांव व कस्बे में जरूर लागू करने की होड़ मची हुई है, लेकिन जनसरोकार के लिए स्थापित समाहरणालय में आमलोगों के हित की अनदेखी भी हो रही है.
ज्ञात हो कि हर तले पर तीन-तीन शौचालय की व्यवस्था है, जो कि समाहरणालय के अंदर एक कोने में स्थित है. इसके कारण कितने आम नागरिकों को शौचालय के बारे में पता नहीं चल पाता. खामियाजा के रूप में शौच के लिए इधर-उधर भटकते रहते हैं.
वहां मौजूद कुछ लोगों ने प्रभात खबर को बताया कि शौचालय में आम आदमियों का प्रवेश वर्जित है. हालांकि हमने जब इस बात पर वहां के कर्मचारियों से बात की तो उन्होंने इनकार कर दिया. फिर भी अगर हम इस बात को भी मान ले कि हर आम आदमी के लिए शौचालय खुला है तब भी लगभग चार हजार लोगों के लिए तीन शौचालय की व्यवस्था नाकाफी लगती है.
सफाई के लिए एक कर्मी है प्रतिनियुक्त : कोई एक भी शौचालय साफ नहीं रहता है. इसका कारण पूछने पर वहां के अधिकारियों ने बताया कि मात्र एक सफाई कर्मचारी वर्तमान में कार्यरत है. इसके अलावा एक व्यक्ति की तैनाती साहब के गोपनीय में है. शौचालय की हालत देख सरकार के स्वच्छता अभियान की हकीकत को समझा जा सकता है.
बिजली के तार को सिर्फ टांग दिया है : समाहरणालय कई जगहों पर कटिंग नंगा तार लटक रहा है तो कहीं बिजली के उपकरण लावारिस खुले पड़े हैं. जिन्हें देखने वाला कोई नहीं है. प्रशासन मौन है. इसके अलावा कई जगहों पर वायरिंग भी जर्जर हो गयी है. कभी भी बिजली की वजह से हादसे घटित हो सकते है.
आपातकालीन स्थिति में निपटने के लिए विशेष व्यवस्था नहीं : समाहरणालय में आपातकालीन स्थिति में निपटने के लिए कोई विशेष व्यवस्था नहीं है. तीन फ्लोर का बना यह कार्यालय जिसमें ऊपर जाने आने के लिये मात्र एक सीढ़ी की व्यवस्था है. 2016 में आयी भूकंप में आपातकालीन रास्ता नहीं होने के कारण कुछ कर्मी समेत आम लोग भी फंस गये थे.
अच्छी बात ये रही कि कोई अनहोनी उस वक्त नहीं हुई थी. फिर भी सावधानी बरतने की जरूरत है. हालांकि उस समय आपातकालीन रास्ता बनाने की बात भी उठी थी, लेकिन बढ़ते समय के साथ यह बातें भी ठंडे बस्ते में चली गयी.
पार्किंग व बैठने के लिए समुचित व्यवस्था का अभाव : समाहरणालय में गाड़ी पार्किंग की भी समस्या हो गयी है. कई बार जगह कम रहने के कारण गाड़ियों का जमावड़ा लग जाता है. जिसके बाद पुलिस वहां खड़ी आम लोगो की गाड़ियों पर चालान काटना शुरू कर देती है.
गैरेज में चलता है पोस्ट ऑफिस
पोस्ट ऑफिस समाहरणालय में स्थित एक गैरेज में संचालित हो रही है. वहां डाकघर के कर्मचारियों ने बताया कि यहां पहले डीएम साहब की गाड़ी लगता था बाद में इसे बाद में इसे पोस्ट ऑफिस बना दिया गया. डाक घर का फर्श बिल्कुल जमीन के समानांतर है. इसके कारण बरसात के मौसम में ऑफिस के अंदर पानी घुस जाता है.
साथ ही पोस्ट ऑफिस में आम लोगों के बैठने के लिए कोई व्यवस्था नहीं है और जगह इतना कम है कि गर्मी के समय में अगर किसी काम को लेकर या कोई फॉर्म भरने के लिए अगर डाकघर में लाइन लगना होता है तो आम लोगों को बाहर धूप में घंटों खड़ा रहना पड़ता है.
किसी बैंक या एटीएम की व्यवस्था नहीं : यहां परिसर में किसी बैंक या एटीएम की व्यवस्था नहीं है. इसके कारण जरूरत पड़ने पर पैसों के लिए लोगों को यत्र तत्र भटकना पड़ता है.
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