कुसहा त्रासदी का एक दशक : पीछा नहीं छोड़तीं तबाही की यादें, नया कोसी बनाने का सपना अब भी अधूरा, अब भी मुआवजे से वंचित हैं कई परिवार

Updated at : 18 Aug 2018 3:14 AM (IST)
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कुसहा त्रासदी का एक दशक : पीछा नहीं छोड़तीं तबाही की यादें, नया कोसी बनाने का सपना अब भी अधूरा, अब भी मुआवजे से वंचित हैं कई परिवार

सहरसा/सुपौल/मधेपुरा : कुसहा त्रासदी के एक दशक पूरे हो गये. आज भी 18 अगस्त, 2008 को कोसी के लोग भूल नहीं पा रहे हैं. इसी दिन कुसहा महा जल प्रलय ने तबाही मचायी थी. यही वह दिन है जब अचानक कोसी नदी ने अपना रास्ता बदल लिया था और लोगों की बस्ती में प्रवेश कर […]

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सहरसा/सुपौल/मधेपुरा : कुसहा त्रासदी के एक दशक पूरे हो गये. आज भी 18 अगस्त, 2008 को कोसी के लोग भूल नहीं पा रहे हैं. इसी दिन कुसहा महा जल प्रलय ने तबाही मचायी थी. यही वह दिन है जब अचानक कोसी नदी ने अपना रास्ता बदल लिया था और लोगों की बस्ती में प्रवेश कर गयी थी. बेकाबू हो कोसी जिधर से गुजरी उधर बालू ही बालू नजर आने लगा. पीड़ित लोग अब भी मंजर को याद कर सिहर जाते हैं. वैसे, इस त्रासदी के बाद कई घोषणाएं हुईं, कई काम भी हुए, लेकिन बेहतर कोसी बनाने का सपना आज भी अधूरा है. कोसी आज भी उजड़ी हुई है. खेतों में बालू भरे हैं और लोग पलायन को मजबूर हैं. कुछ क्षेत्रों के लोगों ने अपने बल पर स्थितियां बदलने की कोशिश की है, लेकिन यह मानक नहीं बन पाया है. मधेपुरा जिले के मुरलीगंज प्रखंड के कई गांवों में ऐसे भी किसान हैं जिनके खेतों से बालू नहीं निकल पाया है.

बेहतर कोसी का सपना है अधूरा : इधर लोगों की मानें तो कुसहा त्रासदी के एक दशक बीतने के बाद पहले से बेहतर कोसी बनाने के सपने अब भी आधे-अधूरे हैं. सड़क व बिजली के क्षेत्र में भले ही अभूतपूर्व कार्य हुए हैं. लेकिन सबसे बड़ी समस्या सिंचाई प्रबंधन के आधारभूत संरचना का पुनर्निर्माण को लेकर है. सरकार द्वारा भारी भरकम राशि पानी की तरह बहाये जाने के बाद भी यहां के किसान साल दर साल बाढ़ व सुखाड़ की समस्या से आक्रांत हैं. प्रखंड क्षेत्र में प्रवाहित नये पुराने उपनदियों पर कई स्थानों में बड़े पुल की दरकार है. पुल-पुलिया के अभाव में ग्रामीण इलाके का बहुत बड़ा हिस्सा मुख्यालय से कटा हुआ है, जहां चचरी पुल ही आवागमन का एकमात्र उपाय बना हुआ है. ग्रामीण इलाकों में चिकित्सा सुविधा अभी भी लोगों के लिए बड़ी समस्या है. बिचौलियों की सक्रियता के कारण बेघर हुए बहुतेरे वास्तविक पीड़ित परिवारों को पुनर्वास का लाभ नहीं मिल पाया. सैकड़ों किसानों को भूमि क्षति एवं फसल क्षति का लाभ नहीं मिलने का दुख आज भी बरकरार है.

तीन जिलों के 526 लोगों की हुई थी मौत : कुसहा महा जल प्रलय में पांच सौ से अधिक लोगों को कोसी अपने साथ बहा ले गयी थी और 30 लाख से अधिक की आबादी बेघर हो गयी थी. मानव निर्मित त्रासदी के असली गुनहगार को सरकार आज तक नहीं खोज पायी. राज्य सरकार द्वारा गठित वालिया जांच समिति की रिपोर्ट आने के बाद कुसहा त्रासदी के जिम्मेदार पर कार्रवाई की मांग की गयी है, लेकिन मुआवजा और ध्वस्त हो चुकी कोसी की संरचनाओं को संवारकर सुंदर कोसी बनाने के सपना अब तक पूरा नहीं हुआ है. कुसहा त्रासदी में ध्वस्त हुए 66203 मकानों में मात्र 17 हजार मकान ही बन पाये हैं. 18 अगस्त, 2008 को नेपाल के कुसहा गांव के समीप लगभग दो किलोमीटर की लंबाई में तटबंध के बह जाने से नेपाल के 34 गांव समेत पूर्वोत्तर बिहार के 441 गांवों की बड़ी आबादी बाढ़ की चपेट में आयी थी. अब तक 526 मृतक के परिजनों को एक साथ ढाई लाख रुपये की राशि नहीं मिली. सरकारी आंकड़ों के अनुसार सहरसा जिले में 41, मधेपुरा में 272 और सुपौल जिले में 213 लोगों की मौत हुई थी.

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