लोकगीतों में देखने को मिलता है छठ पर्व का वास्तविक स्वरूप

मेदनीचौकी : सूर्य षष्ठी व्रत (छठ पर्व) करने की परंपरा काफी पुरानी है. सर्वप्रथम छठ व्रत कश्यप ऋषि के आश्रम में नाग कन्याएं किया करती थीं. बाद में च्यवन ऋषि की पत्नी सुकन्या इस व्रत को देखकर करने लगी. तभी से खासकर महिलाएं छठ व्रत करती आ रही है. इस पर्व के वास्तविक स्वरूप को […]
मेदनीचौकी : सूर्य षष्ठी व्रत (छठ पर्व) करने की परंपरा काफी पुरानी है. सर्वप्रथम छठ व्रत कश्यप ऋषि के आश्रम में नाग कन्याएं किया करती थीं. बाद में च्यवन ऋषि की पत्नी सुकन्या इस व्रत को देखकर करने लगी. तभी से खासकर महिलाएं छठ व्रत करती आ रही है. इस पर्व के वास्तविक स्वरूप को लोकगीतों में बुना गया है. अहले सुबह गांव की महिलाएं इन गीतों को गाती हुई रास्ते को बुहारती हुई नदी तट तक जाती. इन्हीं दिनों श्रद्धालु नदी में कार्तिक स्नान करते हैं.
गलियों में नारी कंठ गूंज उठता है. करबहम छठ के बरतिया दबरु दउरा लेलआ एक प्रसिद्ध लोकगीत जो इस क्षेत्र में प्राय: हर गांव में महिलाएं रोज-ब-रोज सुबह गाती है. खोइचा के लेलअछता गेरुलि सुधि नीर इस गीत में सभी खोइचा में अछत और घड़े में शुद्ध जल लेकर छठी मइया की पूजा करती है और वरदान में एक गुणी पुत्र और हल चलने लायक भूमि मांगती है. एक अन्य गीत है सुनियो अरजिया हमार हे छठि मइया, करिअ छीहम विनती तोहार हे छठि मइया ऐसे ही नर्म नर्मस्पशीं लोकगीतों की गूंज हर रोज सुनायी देती है.
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