21.1 C
Ranchi

लेटेस्ट वीडियो

कृष्ण जन्म को लेकर हैं दो मान्यताएं, कई जगह आज भी मनाया जाएगा कृष्णजन्मोत्सव

पटना : कृष्णाष्टमी को लेकर दो मान्यताएं हैं. एक मान्यता के अनुसार कृष्ण का जन्म अष्टमी तिथि का मध्य रात्रि को हुआ है, जबकि दूसरी मान्यता है कि कि कृष्ण का जन्म उस मध्य रात्रि को हुआ है जिसमें रोहणी नक्षर पड़ता है. इस वर्ष रोहणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि का एक ही मध्य रात्रि में योग नहीं है. इसलिए दोनों मान्यताओं के भक्त अलग अलग तिथि को जन्म उत्सव मनायेंगे.

पटना : कृष्णाष्टमी को लेकर दो मान्यताएं हैं. एक मान्यता के अनुसार कृष्ण का जन्म अष्टमी तिथि का मध्य रात्रि को हुआ है, जबकि दूसरी मान्यता है कि कि कृष्ण का जन्म उस मध्य रात्रि को हुआ है जिसमें रोहणी नक्षत्र पर पड़ता है. इस वर्ष रोहणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि का एक ही मध्य रात्रि में योग नहीं है. इसलिए दोनों मान्यताओं के भक्त अलग अलग तिथि को जन्म उत्सव मनायेंगे. इस वर्ष दिनांक 11 को पूरी रात अष्टमी तिथि है, अतः गृहस्थ के लिए कृष्णजन्म 11 की मध्य रात्रि को है, वहीं वैष्णवों के लिए रोहिणी नक्षत्र 13 की मध्य रात्रि को है, इसलिए उनका कृष्णजन्म उत्सव 13 की मध्य रात्रि से शुरु होगा.

एक रात में नहीं है दोनों योग

इस संदर्भ में कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के पंडित शशिनाथ ने कहते हैं कि ऐसा कई बार होता है जब एक ही मध्यरात्रि को तिथि और नक्षत्र का योग नहीं बन पाता है. वो कहते हैं कि ब्रज परंपरा वाले कृष्णजन्म से पूर्व व्रत करते हैं, जबकि गोकुल परंपरा वाले जन्म के उपरांत व्रत करते हैं. ऐसे में इस वर्ष 11 और 12 अगस्त को गृहस्थ जबकि 13 और 14 अगस्त को वैष्णवों का व्रत होगा.

जन्मकाल के निर्णय में हैं तीन बिंदुएं

महावीर मंदिर पटना के प्रकाशन विभाग के प्रमुख पंडित भवनाथ झा ने इस मामले में विस्तार से बताते हुए कहते हैं कि सबसे पहले श्रीकृष्ण के जन्मकाल का निर्णय करना आवश्यक है, क्योंकि उसी के आधार पर व्रत के दिन का निर्णय होगा. जन्मकाल के निर्णय में तीन बिंदुएँ हैं – अष्टमी तिथि, अर्द्धरात्रि एवं रोहिणी नक्षत्र. अतः जन्मकाल दो प्रकार की होगी, अष्टमी एवं रोहिणी नक्षत्र का योग हो अथवा दोनों का योग न रहे. यदि सौभाग्य से किसी वर्ष तीनों का संयोग हो, तो किसी भी विवेचन की आवश्यकता ही नहीं है.

12 की रात्रि, दिनांक 13 को 1.39 बजे रात्रि से है रोहिणी आरम्भ

इस वर्ष दिनांक 12 की रात्रि, दिनांक 13 को 1.39 बजे रात्रि से रोहिणी आरम्भ है, जो 13 की मध्यरात्रि उपरांत खत्म होता है. इस कालखंड में नवमी तिथि है, अतः इस वर्ष अष्टमी एवं रोहिणी का संयोग नहीं हो रहा है. केवल रोहिणी नक्षत्र एवं अर्द्धरात्रि के योग को कृष्णभक्ति परम्परा के वैष्णवों में प्रचलन है.

उपवास दूसरे दिन किया जाना चाहिए

धर्मशास्त्र की अनेक परम्पराओं का अध्ययन करने के बाद वामन पाण्डुरंग काणे ने निष्कर्ष के रूप में लिखा है कि यदि जयन्ती (रोहिणीयुक्त अष्टमी) एक दिन वाली है, तो उसी दिन उपवास करना चाहिए, यदि जयन्ती न हो तो उपवास रोहिणी युक्त अष्टमी को होना चाहिए, यदि रोहिणी से युक्त दो दिन हों तो उपवास दूसरे दिन किया जाता है, यदि रोहिणी नक्षत्र न हो तो उपवास अर्धरात्रि में अवस्थित अष्टमी को होना चाहिए या यदि अष्टमी अर्धरात्रि में दो दिनों वाली हो या यदि अधरात्रि में न हो तो उपवास दूसरे दिन किया जाना चाहिए। (धर्मशास्त्र का इतिहास, चतुर्थ भाग, पृष्ठ संख्या- 55)

गृहस्थों में अष्टमी तिथि एवं अर्धरात्रि के संयोग का महत्त्व है

गृहस्थों में अष्टमी तिथि एवं अर्धरात्रि के संयोग का महत्त्व है. इस प्रकार रोहिणी का योग न होने पर कृष्णाष्टमी में चार स्थितियाँ होंगी- पूर्व दिन ही अर्द्धरात्रि में अष्टमी का संयोग हो, दूसरे दिन ही अर्द्धरात्रि में योग हो, दोनों दिनों में से किसी दिन अर्धरात्रि और अष्टमी तिथि का योग न रहे तथा दोनों दिन अर्धरात्रि और अष्टमी तिथि का योग रहे. यह भी नियम है कि जिस कर्म के लिए जो काल नियत है उस समय जो तिथि का योग देखा जाता है.

11 को पूरी रात अष्टमी तिथि है

अतः इस वर्ष दिनांक 11 को पूरी रात अष्टमी तिथि है, अतः जन्मकाल दिनांक 11 को मध्यरात्रि में सुनिश्चित है. इस वर्ष काणे के निर्णयानुसार रोहिणी नक्षत्र के बिना अर्धरात्रि की अष्टमी वाले दिन व्रत होगा. इसे जयन्ती व्रत भी कहा गया है. जो लोग आधी रात में जन्मकाल की पूजा करते हैं, उन्हें इसी दिन व्रत करना चाहिए. जो लोग अर्धरात्रि पूजा नहीं करते हैं केवल फलाहार अथवा अन्न-त्याग करते हैं वे अगले दिन 12 को कृष्णाष्टमी मनायेंगे. अतः पंचांग में दोनों दिन व्रत दिया हुआ है.

दो प्रकार के होते हैं कृष्णाष्टमी में व्रत

कृष्णाष्टमी में व्रत दो प्रकार के होते हैं- कृष्णजन्म का व्रत तथा कृष्णजन्मोत्सव का व्रत. अधिकांश गृहस्थ कृष्णजन्म का व्रत करते हैं, वे दिनांक 11 को व्रत रखकर मध्यरात्रि में जन्मकाल की पूजा करेंगे तथा अगले दिन 8 बजकर 9 मिनट के बाद पारणा करेंगे. जबकि वैष्णव परंपरावाले 13 को जयंती व्रत रखेंगे और दर्शनव्रत उनका 14 को होगा.

posted by ashish jha

Prabhat Khabar Digital Desk
Prabhat Khabar Digital Desk
यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

संबंधित ख़बरें

Trending News

जरूर पढ़ें

वायरल खबरें

ऐप पर पढें
होम आप का शहर
News Snap News Reel