सैन्य स्टेशन के प्रस्तावित इलाके में यूपी व दिल्ली के सात लोगों ने खरीदी 70.91 एकड़ जमीन, खरीदारों में राज्यसभा सांसद इमरान प्रतापगढ़ी भी

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सांसद इमरान प्रतापगढ़ी के साथ ठाकुरगंज स्थित रजिस्ट्री ऑफिस के रजिस्ट्रार. यही जमीन सांसद ने खरीदी है | Prabhat Khabar Network

Kishanganj Military Station Controversy: सिलीगुड़ी कॉरिडोर के पास सेना के प्रस्तावित नए सैन्य स्टेशन की जमीन पर रहस्यमयी सौदे सामने आए हैं. सरकारी अधिग्रहण प्रक्रिया के बीच 70 एकड़ से अधिक भूमि बाहरी खरीदारों के नाम पंजीकृत हो गई है. जांच में सात बाहरी खरीदारों के साथ एक सांसद का नाम भी सामने आया है, जिससे कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं.

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Kishanganj Military Station Controversy: सीमांचल के जिले किशनगंज के ठाकुरगंज के भेलागुड़ी मौजा में सेना के नये स्टेशन का निर्माण प्रस्तावित है. इसके लिए भेलागुड़ी मौजा में 189.68 एकड़ निजी भूमि के अधिग्रहण की योजना है. रक्षा मंत्रालय के अधीन रक्षा संपदा विभाग और किशनगंज जिला प्रशासन के बीच 189.68 एकड़ निजी भूमि अधिग्रहित करने को लेकर आधिकारिक पत्राचार के बीच भेलागुड़ी मौजा में अचानक बड़े पैमाने पर जमीन की खरीद-बिक्री शुरू हो गयी. अधिकांश जमीन पर फिलहाल चाय बगान है. सरकारी अभिलेखों और खरीद-बिक्री के कागज (सेल डीड) की पड़ताल से खुलासा हुआ है कि प्रस्तावित क्षेत्र की लगभग 70 एकड़ 91 डिसमिल भूमि महज सात बाहरी खरीदारों के नाम पंजीकृत हुई है.

रजिस्ट्री के उपलब्ध दस्तावेजों में खरीदारों की सूची में राज्यसभा सांसद इमरान प्रतापगढ़ी का नाम भी दर्ज है. दस्तावेजों के अनुसार उनके नाम से 1.61 एकड़ भूमि की खरीद की गयी है. रजिस्ट्री के पेशा वाले कॉलम में स्पष्ट रूप से अंकित है. वहीं, राज्यसभा की आधिकारिक सदस्य निर्देशिका में भी इमरान प्रतापगढ़ी का स्थायी पता उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के चमरूपुर गांव निवासी मोहम्मद इलियास खान के पुत्र के रूप में दर्ज है. रजिस्ट्री दस्तावेजों और राज्यसभा की आधिकारिक सदस्य निर्देशिका में दर्ज विवरण का मिलान करने पर दोनों में नाम और स्थायी पते का विवरण एक-दूसरे से मेल खाता है.

सिलीगुड़ी कॉरीडोर के पास है भेलागुड़ी मौजा

ठाकुरगंज प्रखंड का मौजा भेलागुड़ी भौगोलिक और सुरक्षा की नज़र से बेहद खास स्थिति में है. यह इलाका भारत के मुख्य भू-भाग को पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ने वाले एकमात्र संकरे रास्ते 'सिलीगुड़ी कॉरिडोर' के बिल्कुल पास है. नेपाल, बांग्लादेश और भूटान की अंतरराष्ट्रीय सीमा के नजदीक होने के कारण यह क्षेत्र सैन्य दृष्टिकोण से अति-संवेदनशील है. इसी वजह से रक्षा संपदा विभाग और जिला प्रशासन ने यहां सेना के नए स्टेशन के लिए 189.68 एकड़ निजी भूमि लेने के लिए फाइल आगे बढ़ायी थी. उपलब्ध आधिकारिक और रजिस्ट्री दस्तावेजों के अनुसार, सैन्य स्टेशन की प्रशासनिक प्रक्रिया और निजी खरीद की समयरेखा एक-दूसरे के बेहद करीब दिखती है.

सरकारी प्रक्रिया धीमी, रजिस्ट्रियों की तेज रफ्तार

उपलब्ध आधिकारिक और रजिस्ट्री दस्तावेजों के अनुसार, सैन्य स्टेशन की प्रशासनिक प्रक्रिया और निजी खरीद की समयरेखा (Timeline) एक-दूसरे के बेहद करीब दिखती है:

  • 01 अक्तूबर 2025 : सैन्य स्टेशन की स्थापना के लिए प्रारंभिक सरकारी कार्रवाई और बातचीत शुरू हुई.
  • 07 नवंबर 2025 : प्रशासनिक स्तर पर चिह्नित भूमि का मिलकर ज़मीन का मुआयना शुरू किया गया.
  • 21 जनवरी 2026 : जिला प्रशासन और भू-अर्जन कार्यालय द्वारा भूमि अधिग्रहण को लेकर खास बैठक.
  • 10 फरवरी 2026 : जिला प्रशासन और भू-अर्जन कार्यालय द्वारा भूमि अधिग्रहण को लेकर अंतिम चरण की बातचीत.
  • 11 फरवरी 2026 : भेलागुड़ी मौजा की जमीनों की ताबड़तोड़ रजिस्ट्रियां होनी शुरू.
  • 28 मार्च 2026 : एक ही दिन में कई बड़े भूमि सौदों का पंजीकरण कराया गया. रजिस्ट्री कार्यालय में एक ही दिन में कई बड़े रकबे के विक्रय-पत्र दर्ज किये गये. अब तक सामने आये 16 रजिस्टर्ड दस्तावेजों में कुल 70 एकड़ से अधिक की खरीद दिखायी गयी है.

इतनी तेजी से जमीन की रजिस्ट्रियां क्यों हुईं?

सरकारी स्तर पर सेना के प्रस्तावित स्टेशन के लिए भूमि चिह्नित करने की प्रक्रिया और लगभग उसी अवधि में बड़े पैमाने पर हुई जमीन की खरीद-बिक्री ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. सवाल यह है कि जब रक्षा संपदा विभाग और जिला प्रशासन के बीच भूमि अधिग्रहण को लेकर लगातार पत्राचार, संयुक्त निरीक्षण और प्रशासनिक कवायद चल रही थी, तब उसी क्षेत्र में इतनी तेजी से जमीन की रजिस्ट्रियां क्यों हुईं? क्या यह महज संयोग था या फिर संभावित अधिग्रहण और उससे मिलने वाले मुआवजे की संभावना को देखते हुए निवेश किया गया? इन सवालों का जवाब फिलहाल उपलब्ध दस्तावेजों से स्पष्ट नहीं होता. पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर तब सामने आएगी, जब जिला प्रशासन और रक्षा मंत्रालय प्रस्तावित 189.68 एकड़ भूमि की अंतिम खाता-खेसरा सूची सार्वजनिक करेंगे और यह स्पष्ट होगा कि खरीदी गई जमीनें अधिग्रहण के दायरे में आती हैं या नहीं.

दिल्ली और यूपी का कनेक्शन: किसने कितनी जमीन खरीदी?

हैरानी की बात यह है कि इन सभी 15 खरीद-बिक्री के कागज़ में किसी भी खरीदार का स्थायी पता किशनगंज जिले या बिहार का नहीं है. सभी खरीदार उत्तर प्रदेश और देश की राजधानी दिल्ली के रहने वाले हैं:

खरीदार का नामदर्ज स्थायी पताखरीदी गई कुल भूमि
मोहम्मद सलमान खान24-F, सेक्टर-7, जसोला विहार, दक्षिण दिल्ली14.09 एकड़
मोहम्मद सुल्तानचमरूपुर शुकुलान, जिला- प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश)13.93 एकड़
सुलेमान खानचमरूपुर शुकुलान, जिला- प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश)13.12 एकड़
मोहम्मद शमीमजसोला, दक्षिण दिल्ली11.72 एकड़
मोहम्मद अनसमऊ (उत्तर प्रदेश)9.05 एकड़
तश्कील अहमदचमरूपुर शुकुलान, जिला- प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश)7.35 एकड़
इमरान प्रतापगढ़ीचमरूपुर शुकुलान, जिला- प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश)1.61 एकड़

सरकारी दस्तावेजों में एक ऐसा नाम सामने आया जिसने सबको चौंका दिया: 'पार्लियामेंट मेंबर'!

इस पूरे मामले ने तब राजनीतिक और प्रशासनिक मोड़ ले लिया जब रजिस्ट्री के कुछ खास विलेखों (संख्या 1418, 1420 और 1426) की जांच की गई.

  • इन दस्तावेजों में खरीदार के रूप में इमरान प्रतापगढ़ी, पिता-मोहम्मद इलियास खान, निवासी ग्राम- चमरूपुर शुकुलान, जिला- प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश) का नाम स्पष्ट रूप से दर्ज है.
  • सबसे खास बात यह है कि विलेख के 'पेशा' (Profession) वाले कॉलम में साफ तौर पर "खेती वगैरह एवं पार्लियामेंट मेंबर" लिखा हुआ है.
  • राज्यसभा की आधिकारिक सदस्य निर्देशिका (Official Directory) के अनुसार भी कांग्रेस के राज्यसभा सांसद इमरान प्रतापगढ़ी का स्थायी पता यही दर्ज है. हालांकि, दोनों के एक ही व्यक्ति होने की 100% आधिकारिक पुष्टि के लिए प्रशासनिक स्तर पर स्वतंत्र जांच की दरकार है.

भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया नहीं हुई है शुरू : सीओ

ठाकुरगंज के अंचलाधिकारी मृत्युंजय कुमार ने स्पष्ट किया कि फिलहाल भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है. उन्होंने बताया कि अभी केवल संबंधित जमीनों की जांच और सत्यापन का कार्य किया जा रहा है. जांच पूरी होने के बाद ही अधिग्रहण को लेकर कोई अंतिम निर्णय या औपचारिक प्रक्रिया प्रारंभ होगी.

Kishanganj Military Station Controversy: क्या इस मामले में गोपनीय सूचनाओं के लीक होने की आशंका है? उठ रहे कई प्रश्न

जमीन खरीदना किसी भी नागरिक का वैध कानूनी अधिकार है, लेकिन जब मामला देश की सुरक्षा और सैन्य स्टेशन से जुड़ा हो, तो इस पूरी क्रोनोलॉजी पर कई गंभीर सवाल खड़े होते हैं:

  1. क्या विभागों को भनक थी?: क्या रक्षा संपदा विभाग, निबंधन कार्यालय और जिला प्रशासन को इस बात की जानकारी थी कि जिस जमीन को सेना के लिए लेने के लिए ज़मीन का मामला चल रहा है, उसे बाहरी लोग धड़ल्ले से खरीद रहे हैं?
  2. समीक्षा क्यों नहीं हुई?: क्या अधिग्रहण प्रक्रिया के दौरान निबंधन (रजिस्ट्री) पर रोक लगाने अथवा इसकी उच्च स्तरीय समीक्षा करने का प्रयास किया गया?
  3. मुआवजे का खेल?: अगर यह 70.91 एकड़ ज़मीन सेना के लिए अधिग्रहित होने वाली 189.68 एकड़ ज़मीन का हिस्सा है, तो ज़ाहिर है करोड़ों रुपये का मुआवज़ा दिया जाएगा. ऐसे में सवाल उठता है कि इस भारी भरकम मुआवज़े का असली हक़दार कौन होगा?

इन सवालों के जवाब आम जनता के लिए फिलहाल उपलब्ध नहीं हैं, और सीमांचल जैसे संवेदनशील इलाके में हुई इन ज़मीन की खरीद-फरोख्त की गहराई से जांच की ज़रूरत है.


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बच्छराज

लेखक के बारे में

By बच्छराज

बच्छराज प्रिंट माध्यम में 25 वर्षों से और डिजिटल माध्यम में पिछले 3 सालों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. ठाकुरगंज (किशनगंज) क्षेत्र में काम कर रहे हैं. सामाजिक कार्यों, शिक्षा, राजनीति व खेल में रुचि रखते हैं.

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