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धूम्रपान के चक्कर में खुद को ना करें बीमार: डॉ. शिव कुमार

Updated at : 19 Nov 2025 7:54 PM (IST)
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धूम्रपान के चक्कर में खुद को ना करें बीमार: डॉ. शिव कुमार

प्रदूषण के कारण बढ़ रहा है सीओपीडी का खतरा.

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– विश्व सीओपीडी दिवस

-प्रदूषण के कारण बढ़ रहा है सीओपीडी का खतरा.

-दिनचर्या को संतुलित और जागरूकता से ही इससे बचा जा सकता है.

किशनगंज

विश्व सीओपीडी दिवस प्रतिवर्ष नवंबर महीने के तीसरे बुधवार को पूरी दुनियां में मनाया जाता है. इस गंभीर बीमारी से कैसे बचा जाए, इसके लिए जागरूकता अभियान सहित कई तरह के आयोजन किये जाते है. इस दिवस को मनाने का उद्देश्य संपूर्ण विश्व में क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) के प्रति जागरूकता पैदा करना होता है. धूम्रपान की वजह से युवा पीढ़ी इस बीमारी की चपेट में आ रही है. डब्ल्यूएचओ के अनुसार भारत में दस करोड़ से अधिक लोग इस रोग की चपेट में आ चुके हैं. साल 2021 के आंकड़ों के अनुसार इस बीमारी से साढ़े तीन मिलियन मौतें हुई थी और इस बीमारी का प्रसार लगातार बढ़ रहा है देश ही नहीं बिहार में भी इस बीमारी से लाखों लोग पीड़ित है. लिहाजा वैश्विक स्तर पर सांस रोग संबंधी समस्याएं गंभीर चिंता का कारण बनी हुई हैं. क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) एक ऐसी बीमारी है जो फेफड़ों और वायु मार्ग को प्रभावित करती है. इस रोग के कारण वायु मार्ग अवरुद्ध हो जाता है, जिससे सांस लेना मुश्किल हो सकता है. वायु मार्ग में सूजन और जलन की दिक्कत होने लगती है. सीओपीडी दिवस की पूर्व संध्या पर चिकित्सक डा शिव कुमार ने शहर के फारिंगगोला स्थित आशिर्वाद हेल्थ सेंटर में आयोजित कार्यशाला में चिकित्सकों ने जानकारी देते हुए बताया कि फेफड़ों की इस बीमारी से बचाव के लिए नियमित योगासनों का अभ्यास कर सकते हैं. योग फेफड़ों की सेहत का ख्याल रखने के साथ ही श्वसन समस्याओं को कम करते हैं और वायु मार्ग को बेहतर बनाते हैं. धूम्रपान से दूर रहे. धूम्रपान के चक्कर में रहकर अपने स्वास्थ्य को खराब नहीं करें.

जागरूकता के अभाव में जानलेवा हो रहा है सीओपीडी

विशेषज्ञ चिकित्सक की की मानें तो तो सीओपीडी का निदान जल्दी नहीं होता. ऐसा इसलिए है क्योंकि इसके शुरुआती लक्षणों को सामान्य उम्र बढ़ने फिटनेस की कमी या धूम्रपान के कारण होने वाली खांसी समझ लिया जाता है. बहुत से लोग बिना यह समझे कि कुछ गड़बड़ है, सांस फूलने की आदत डाल लेते हैं. यही देरी एक बड़ी वजह है कि सीओपीडी का निदान अक्सर बाद में होता है, जब फेफड़ों की क्षति पहले ही बढ़ चुकी होती है. बढ़ती जागरूकता से लोगों को यह समझने में मदद मिल रही है कि सांस लेने में कठिनाई को कभी भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए. सीओपीडी अक्सर 35 से 40 साल से अधिक उम्र में होता है, यह बीमारी अक्सर उन लोगों में होती है, जिनमें धूम्रपान का इतिहास हो या लम्बे समय तक रसायनों, धूल, धुंआ या खाना पकाने वाले ईंधन के संपर्क में रहते हैं.

जन जागरूकता से ही इस बीमारी के प्रभाव को रोका जा सकता है

इस वर्ष का थीम है सांस की तकलीफ तो सीओपीडी के बारे में सोचें, विश्व सीओपीडी दिवस उपचार में हुई प्रगति पर भी प्रकाश डालता है. हाल के वर्षों में, इनहेलर तकनीक में सुधार हुआ है,

कहतें हैं चिकित्सक

विश्व सीओपीडी दिवस हमें याद दिलाता है कि सांस ही जीवन है. प्रारंभिक जागरूकता, शीघ्र निदान और निरंतर देखभाल सीओपीडी से पीड़ित लोगों की पीड़ा को कम करती है और उनके दैनिक जीवन को बेहतर बनाती है.यदि आपको लगातार खांसी, सांस फूलना या बार-बार छाती में संक्रमण दिखाई दे,तो तुरंत उपचार जरूरी है.

जरा भी दिक्कत होने पर तुरंत डॉक्टर की सलाह पर उपचार शुरू कर देना चाहिए.सूबे में करीब तीन फीसदी आबादी सीओपीडी की गिरफ्त में है. जिले में ही हज़ारों की आबादी इस बीमारी की चपेट में है.

डॉ शिव कुमार

फोटो 11 डा शिव कुमार

विभागाध्यक्ष,टीबी एवं चेस्ट,एमजीएम

मेडिकल कॉलेज किशनगंज. B

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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By AWADHESH KUMAR

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