बिहार का यह अधूरा पुल बना लोगों की जिंदगी का बोझ! रिश्ते, अंतिम संस्कार और इलाज सब पर लगा ब्रेक
Published by : Abhinandan Pandey Updated At : 24 Jun 2025 1:02 PM
अधूरे पुल की तस्वीर
Bihar News: किशनगंज जिले के दल्लेगांव पंचायत में मेची नदी पर बना पुल लोगों के लिए सुविधा नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की मुश्किलों का कारण बन गया है. पुल बनकर तैयार है, लेकिन एप्रोच रोड नहीं बनने के कारण गांव के लोग अब भी बदहाली झेलने को मजबूर हैं.
Bihar News: बिहार के किशनगंज जिले के दल्लेगांव पंचायत में बना मेची नदी पर पुल विकास का प्रतीक बनने के बजाय स्थानीय लोगों के लिए एक अभिशाप बन गया है. साल 2023 में बनकर तैयार हुए इस पुल का एप्रोच रोड आज तक नहीं बन पाया है. पुल होकर गुजरने का रास्ता नहीं, और रास्ता नहीं तो ज़िंदगी की सबसे ज़रूरी चीजें- शादी, इलाज, अंतिम संस्कार सब प्रभावित हो रही हैं.
रिश्ते भी अब रास्तों से तय होते हैं
पंचायत के दल्लेगांव, बैगनबाड़ी, तेलीभिट्टा और भवानीगंज जैसे गांवों के युवाओं को शादी के प्रस्ताव नहीं मिल रहे. ग्रामीण बताते हैं, “लोग साफ कहते हैं- सड़क नहीं तो रिश्ता नहीं.” गांव की बेटियों को ससुराल ले जाना, परिवार के लिए एक चुनौती बन गया है, क्योंकि रास्ता नहीं, बस खतरे से भरी नदी है.
अंतिम यात्रा भी बनी जंग
स्थानीय जनप्रतिनिधियों का कहना है कि, “आज़ादी के 78 साल बाद भी हमारा इलाका मुख्यधारा से जुड़ नहीं पाया.” गांव का कब्रिस्तान नदी के उस पार है. बरसात के दिनों में शवों को नाव से ले जाकर रेत पर आधा किलोमीटर तक कंधे पर ले जाना पड़ता है. नदी की तेज़ धार कई बार शव यात्रा को मौत का सफर बना देती है.
गर्भवती महिलाएं और मरीज सबसे ज्यादा प्रभावित
नदी पार बसे गांवों की गर्भवती महिलाओं को नाव से अस्पताल ले जाया जाता है, और कई बार रास्ते में ही प्रसव हो जाता है. एंबुलेंस सेवा उपलब्ध नहीं, नाव ही एकमात्र सहारा है. कुछ साल पहले एक महिला की डिलीवरी के दौरान मौत के बाद लोगों ने 2019 में लोकसभा चुनाव का बहिष्कार तक कर दिया था. प्रशासन ने पुल तो बनवा दिया, लेकिन अधूरा ही छोड़ दिया.
सवाल वहीं- विकास कहां है?
यह अधूरा पुल न सिर्फ विकास की असफलता का प्रतीक है, बल्कि उन लाखों लोगों की रोज़मर्रा की लड़ाई का भी प्रमाण है, जो अब भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं. दल्लेगांव का पुल सिर्फ अधूरा नहीं है, ये एक पूरे क्षेत्र के अधूरे वादों और टूटी उम्मीदों की तस्वीर है.
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By Abhinandan Pandey
अभिनंदन पांडेय पिछले दो वर्षों से डिजिटल मीडिया और पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत प्रिंट मीडिया से की और दैनिक जागरण, भोपाल में काम किया. वर्तमान में वह प्रभात खबर डिजिटल बिहार टीम के हिस्सा हैं. राजनीति, खेल और किस्से-कहानियों में उनकी खास रुचि है. आसान भाषा में खबरों को लोगों तक पहुंचाना और ट्रेंडिंग मुद्दों को समझना उन्हें पसंद है. अभिनंदन ने पत्रकारिता की पढ़ाई माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल से की. पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने पत्रकारिता की बारीकियों को समझना शुरू कर दिया था. खबरों को सही तरीके से लोगों तक पहुंचाने की सोच ने उन्हें इस क्षेत्र की ओर आकर्षित किया. दैनिक जागरण में रिपोर्टिंग के दौरान उन्होंने भोपाल में बॉलीवुड के कई बड़े कलाकारों और चर्चित हस्तियों के इंटरव्यू किए. यह अनुभव उनके करियर के लिए काफी अहम रहा. इसके बाद उन्होंने प्रभात खबर डिजिटल में इंटर्नशिप की, जहां उन्होंने डिजिटल पत्रकारिता की वास्तविक दुनिया को करीब से समझा. बहुत कम समय में उन्होंने रियल टाइम न्यूज लिखना शुरू कर दिया. इस दौरान उन्होंने सीखा कि तेजी के साथ-साथ खबर की सटीकता भी बेहद जरूरी होती है. फिलहाल वह प्रभात खबर डिजिटल बिहार टीम के साथ काम कर रहे हैं. बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने कई बड़ी खबरों को रियल टाइम में कवर किया, ग्राउंड रिपोर्टिंग की और वीडियो कंटेंट भी तैयार किए. उनकी कोशिश हमेशा यही रहती है कि पाठकों और दर्शकों तक सबसे पहले, सही और भरोसेमंद खबर पहुंचे. पत्रकारिता में उनका लक्ष्य लगातार सीखते रहना, खुद को बेहतर बनाना और एक विश्वसनीय पत्रकार के रूप में अपनी पहचान मजबूत करना है.
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