पोषण की हरियाली से बदली आदतें: आंगनवाड़ी बना गांव के बदलाव की मिसाल

सुबह की हल्की धूप जैसे ही चिचूआ बाड़ी दक्षिण (केंद्र संख्या 54) के आंगनवाड़ी परिसर में उतरती है, वहां का दृश्य अपने आप में बदलाव की कहानी कहता है
– खेल-खेल में सीख रहे पोषण का महत्व, बच्चों में दिखा सकारात्मक बदलाव
-खुद उगाई सब्ज़ियां, अब बच्चों की पहली पसंद
-पोषण वाटिका बनी कुपोषण के खिलाफ मजबूत आधार
किशनगंजसुबह की हल्की धूप जैसे ही चिचूआ बाड़ी दक्षिण (केंद्र संख्या 54) के आंगनवाड़ी परिसर में उतरती है, वहां का दृश्य अपने आप में बदलाव की कहानी कहता है. क्यारियों में लहलहाती हरी सब्ज़ियों के बीच छोटे-छोटे बच्चे उत्साह से इधर-उधर घूमते नजर आते हैं. कोई पालक की पत्तियां तोड़ रहा है, तो कोई टमाटर को छूकर पहचानने की कोशिश कर रहा है. तभी एक बच्चा मुस्कुराते हुए सेविका शमीमा खातून के पास आता है और कहता है दीदी, आज हम यही साग खाएंगे. यह दृश्य अब यहां की रोज़मर्रा की पहचान बन चुका है, लेकिन कुछ साल पहले तक यह केंद्र भी एक साधारण आंगनवाड़ी की तरह ही था, जहां बच्चों की उपस्थिति सीमित थी और पोषण को लेकर जागरूकता भी कम थी.
सामान्य केंद्र से ‘सीखने और अपनाने’ का केंद्र बना
आंगनबाड़ी केंद्र चिचूआ बाड़ी दक्षिण जो कि कस्बा कालियागंज पंचायत व पोठिया प्रखंड अंतर्गत यह केंद्र वर्ष 2023 में पोषण वाटिका की शुरुआत के बाद तेजी से बदला. अब यह सिर्फ सेवाएं देने वाला केंद्र नहीं, बल्कि बच्चों और परिवारों को सही खानपान सिखाने का माध्यम बन गया है. अब तक इस पहल से लगभग 120–150 बच्चे प्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित हो चुके हैं, वहीं 80 से अधिक गर्भवती एवं धात्री महिलाएं भी इससे जुड़ी हैं. केंद्र में मिलने वाले ताज़े साग-भाजी ने बच्चों के भोजन में विविधता लाई है, जिससे उनके स्वास्थ्य में सुधार देखा गया है.
खुद उगाकर खाने से बढ़ी रुचि
आंगनवाड़ी सेविका शमीमा खातून बताती हैं कि पहले बच्चे सब्ज़ियों से दूर भागते थे, लेकिन अब खुद उगाते हैं और खुशी-खुशी खाते हैं. इससे उनकी आदत भी बदली है और सेहत भी. यह बदलाव सिर्फ केंद्र तक सीमित नहीं रहा. गांव के करीब 50 परिवारों ने अपने घरों में भी छोटी-छोटी पोषण वाटिकाएं शुरू कर दी हैं. स्थानीय अभिभावक मोबिद आलम कहते हैं. पहले हम बाजार से सब्ज़ी लाते थे, अब घर में ही उगाते हैं. बच्चा खुद कहता है कि हरी सब्ज़ी चाहिए, तो हमें भी ध्यान रखना पड़ता है.
कुपोषण में आई कमी, बढ़ी जागरूकता
स्थानीय आशा कार्यकर्ता रुखसाना खातून ने बताया कि इस पहल के बाद बच्चों में कुपोषण की समस्या में लगभग 30–40 प्रतिशत तक कमी आई है. नियमित हरी सब्ज़ी खाने से बच्चों की ताकत और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ी है. यह पहल आईसीडीएस और स्वास्थ्य विभाग के समन्वय का उदाहरण बन चुकी है, जिसमें समुदाय की भागीदारी ने इसे और मजबूत बनाया है.
स्थानीय जनप्रतिनिधि जावेद अंसारी इस बदलाव को गांव के भविष्य से जोड़ते हुए कहते हैं कि यह सिर्फ एक बगिया नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ी को स्वस्थ बनाने की नींव है. अगर हर जगह ऐसा हो, तो कुपोषण खुद खत्म हो जाएगा.व्यवहार में बदलाव का बना मॉडल
पहले जहां बच्चों के भोजन में विविधता की कमी थी और पोषण को लेकर जागरूकता सीमित थी, वहीं अब बच्चे खुद सब्ज़ियां पहचानते हैं, खाने में रुचि लेते हैं और घर में भी वही आदतें अपना रहे हैं. आज यह आंगनवाड़ी केंद्र आसपास के अन्य केंद्रों के लिए भी प्रेरणा बन रहा है. लोग यहां आकर सीख रहे हैं और अपने क्षेत्रों में इसे अपनाने की कोशिश कर रहे हैं.प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
Prabhat Khabar App :
देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए




