अब खुद की पहचान का प्यासा है कुआं
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :09 Apr 2017 4:51 AM (IST)
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बदलाव . कुआं बचाने को सरकार के पास नहीं कोई योजना पौआखाली : जल संरक्षण का महत्वपूर्ण स्रोत कुआं हमारी प्राचीन सभ्यता व संस्कृति का हिस्सा अवश्य रहा है. एक समय था जब इससे लोगों की प्यास बुझती थी. लेकिन अब ऐसा नहीं. तपती दुपहरिया में अब लोगों की इससे प्यास नहीं बुझ पाती. कभी […]
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बदलाव . कुआं बचाने को सरकार के पास नहीं कोई योजना
पौआखाली : जल संरक्षण का महत्वपूर्ण स्रोत कुआं हमारी प्राचीन सभ्यता व संस्कृति का हिस्सा अवश्य रहा है. एक समय था जब इससे लोगों की प्यास बुझती थी. लेकिन अब ऐसा नहीं. तपती दुपहरिया में अब लोगों की इससे प्यास नहीं बुझ पाती. कभी पूरे क्षेत्र में पेयजल एवं सिंचाई कुआं पर आधारित थी. अमूमन हर गांवों में 8-10 कुआं होता था.
सरकारी स्तर पर कुआं बनाने की कोई योजना नहीं : पौआखाली थाना क्षेत्र में कुल गांवों की संख्या 45 है. मगर आज इन गांवों में कुंआ का अस्तित्व मिटते जा रहा है. ग्राम पंचायत में कुल 14 वार्डों में पौआखाली बाजार से सटे मुहल्लों, शीमलबाड़ी, शीशागाछी, एलआरपी चौक, पवना, होदीखोदरा, मीरभिट्टा आदि गांवों में 80 फीसदी लोगों के घरों में कुएं के स्थान पर लगे हैंडपंप से आयरन युक्त पानी निकल रहा है, जिसे न चाहते हुए भी पीकर अपनी प्यास बुझा रहे हैं. आज तक प्रशासन या स्थानीय जनप्रतिनिधियों के द्वारा बेकार पड़े कुओं की देखभाल या साफ-सफाई को लेकर उसे पुनः इस्तेमाल में लाने के लिए पहल मात्र तक करते नही देखा जा सका है. इसका पानी शत-प्रतिशत शुद्ध और आरोग्य प्रदान करने वाला होता है. इसमें आर्सेनिक की मात्रा नहीं होती है. लेकिन सरकारी स्तर पर कुआं बनाने के लिए कोई योजना नहीं है.
हर गांवों में 8-10 कुआं होता था
अभियान चलाने की जरूरत
कुआं के अस्तित्व को बचाने के लिए लोगों के बीच जागरूकता फैलाने में लगे सिकंदर पटेल कहते हैं कुओं को संरक्षित कर भू-गर्भीय जल स्तर को गिरने से बचाया जा सकता है. ग्रामीण इलाकों के पुराने कुएं को साफ कर बरसात के पानी को उसमें पहुंचा कर गिरते जल स्तर की रोकथाम का प्रयास सार्थक सिद्ध हो सकता है. ग्रामीण मनोज सिन्हा, सेवानिवृत्त शिक्षक चक्रधर प्रसाद सिन्हा के अनुसार, गांवों में कुआं को ‘इंद्रासन माता’ माना जाता था एवं इनका विधिवत विवाह कराया जाता था. कुओं पर ही पानी भरने के क्रम में लड़कियां सखी बनती बनाती थीं. लेकिन अब ये कुएं मिटते जा रहे हैं. कभी प्यासा जाता था कुएं के पास. अब खुद पहचान को प्यासा बना है कुआं. क्षेत्र से धीरे-धीरे कुएं विलुप्त होते जा रहे हैं.
कहते हैं चिकित्सक
आइएमए के पदाधिकारी डा देवेंद्र प्रसाद बताते हैं कि कुएं के पानी का सेवन करने वाले लोगों को पेट संबंधित बीमारियां कम होती हैं. क्योंकि इसमें आर्सेनिक एवं अन्य हानिकारक तत्वों की मात्रा कम होती है. बशर्ते कुएं को समय-समय पर सही ढंग से सफाई कराकर ढका होना चाहिए.
कहते हैं मुखिया
पंचायत में आयरन युक्त पानी एक गंभीर समस्या है. हर घर में शुद्ध पेयजल लोगों को नसीब हो इसके लिए तेजी से समुचित प्रयास और जन चेतना की आवश्यकता है. सरकार की महत्वाकांक्षी योजना हर घर नल-जल पूरे पंचायत में जरूरी है तभी लोगों को इस संकट से मुक्ति मिल पाएगी.
जरजीश हुसैन, मुखिया, ग्राम पंचायत, पौआखाली.
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