बेघर होने की कगार पर निटाल बस्ती के दर्जनों परिवार

Published at :12 Dec 2017 4:34 AM (IST)
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बेघर होने की कगार पर निटाल बस्ती के दर्जनों परिवार

रेल प्रशासन का दावा,जमीन हमारी है ठाकुरगंज : ठाकुरगंज के निटाल बस्ती के वे दर्जनों परिवार इन दिनों परेशान हैं. जिनके पास जमीन के नाम पर चंद टुकड़े हैं जिस पर उनका मकान बना हुआ है. लेकिन अंचल कार्यालय की एक गलती ने इन्हें आज उजड़ने को विवश कर दिया है. जिन्दगी भर की कमाई […]

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रेल प्रशासन का दावा,जमीन हमारी है

ठाकुरगंज : ठाकुरगंज के निटाल बस्ती के वे दर्जनों परिवार इन दिनों परेशान हैं. जिनके पास जमीन के नाम पर चंद टुकड़े हैं जिस पर उनका मकान बना हुआ है. लेकिन अंचल कार्यालय की एक गलती ने इन्हें आज उजड़ने को विवश कर दिया है. जिन्दगी भर की कमाई से खरीदी गई जमीन आज इस आधार पर सरकार वापस ले रही है कि जमीन साठ के दशक में ही रेलवे द्वारा अधिग्रहित की जा चुकी है जबकि इन वर्षों ही नहीं कई दशकों में दर्जनों लोगों ने न केवल ठाकुरगंज-पिपरिथान स्टेशन के बीच में एनएच 327 ई पर मौजूद रेल गुमटी के समीप जमीन खरीदी बल्कि अपनी सारी जमा पूंजी लगा कर उस पर अपना आशियाना भी बना लिया.
परन्तु इस रेल फाटक पर बनने वाली आरओबी के कारण इन लोगों को अब अतिक्रमणकारी की संज्ञा दे दी गई है और इन्हें जमीन खाली करने का नोटिस भी थमा दिया गया. जिसके बाद सोमवार को दर्जनों लोगों ने नगर के मुख्य पर्षद देवकी अग्रवाल से मुलाकात कर इस मामले में पहल की मांग की है. पूर्व उप मुख्य पार्षद सह वार्ड आयुक्त कृष्णा सिन्हा के नेतृत्व में प्रभावित लोगों ने मुख्य पार्षद से मिल कर अपनी पीड़ा बतायी. इस दौरान सैदुल ताहिर प्रकाश रुक्का अख्तर, संतोष पासवान, फरीद, शांति देवी, गंगा पासवान आदि ने आवेदन देते हुए बताया की इन लोगों ने आवासीय हिसाब से जमीन खरीदी़ सरकारी नियमों के अनुसार उसका दाखिल खारिज करवाया और वजाप्ते रसीद भी कटवा रहे हैं.
लेकिन इन सबके बावजूद उन्हें अतिक्रमणकारी बता कर भूमि खाली करने का नोटिस दे दिया गया. भू स्वामियों का कहना है की यदि उक्त जमीन बिहार सरकार ने अधिग्रहित कर रेलवे को सौंप दिया तो क्यों नहीं रजिस्टर टू में उक्त जमीन माइनस की गई. यदि उसी वक्त सरकारी कर्मी अपनी जिम्मेवारी निभाते तो आज यह हालात गरीबों को नहीं देखना पड़ता.
क्या कहते है अंचलाधिकारी
वहीं इस मामले में अंचलाधिकारी मो इस्माइल ने बताया की दस्तावेजी सबूत यही कहते हैं की साठ के दशक में ही उक्त भूमि बिहार सरकार ने अधिग्रहित कर रेलवे को दे दी थी और उसी वक्त भूस्वामियों को मुआवजा दे दिया गया था. वहीं जानकारों का मानना है की इलाके में अधिकतर भूमि विवाद की जड़ में यही रजिस्टर टू ही है.
राजस्व कर्मी नई खरीद बिक्री के बाद दाखिल ख़ारिज तो कर देते हैं लेकिन रजिस्टर टू में माइनस नहीं करने के कारण वर्षों बाद भूस्वामी के परिजन उक्त जमीन पर अपना दावा ठोक देते हैं और विवाद की शुरुआत हो जाती है.
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