किशनगंज का लाल निभा रहा बॉलीवुड फिल्म में मुख्य किरदार

Published at :04 Jul 2017 4:48 AM (IST)
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किशनगंज का लाल निभा रहा बॉलीवुड फिल्म में मुख्य किरदार

किशनगंज : हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती, लहरों से डर कर नैया पार नहीं होती. कवि हरिवंश बच्चन की जीवंत इन पंक्तियों को अपने जीवन में उतार कर दिखाया है शहर के करबला रहमतनगर निवासी मो साहिल अंसारी ने. इसी महीने के 21 जुलाई को वॉलीवुड फ़िल्म मुकद्दरपुर का मजनू देश के करीब […]

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किशनगंज : हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती, लहरों से डर कर नैया पार नहीं होती. कवि हरिवंश बच्चन की जीवंत इन पंक्तियों को अपने जीवन में उतार कर दिखाया है शहर के करबला रहमतनगर निवासी मो साहिल अंसारी ने. इसी महीने के 21 जुलाई को वॉलीवुड फ़िल्म मुकद्दरपुर का मजनू देश के करीब 800 सिनेमा घरों में रिलीज हो रही है.

फिल्म में साहिल अंसारी ने मुख्य किरदार बखूबी निभाया है. किशनगंज के इतिहास में पहला युवा साहिल है जिसने वॉलीवुड फ़िल्म में मुख्य किरदार निभाया है. देश के सबसे पिछड़ा जिलों में शामिल किशनगंज से सपनों की नागरी में जाकर वॉलीवुड फ़िल्म में लीड रोल करना गर्व की बात है. यहां के युवाओं में प्रतिभा की कमी नहीं है. जरूरत है उसे सही दिशा व मार्गदर्शन देने की. साहिल के पिता अब्दुल अजीज कृषि विभाग के रिटायर्ड कर्मचारी है. ‘प्रभात खबर’ से खास मुलाकात में साहिल अंसारी ने कहा की मुक़द्दरपुर का मजनू मेरी पहली वॉलीवुड फ़िल्म है. फ़िल्म की पटकथा यूपी के गरीब नाई के लड़के पर आधारित है.

जिसके जीवन में बचपन से ही फीमेल लव नहीं मिल पाया. फ़िल्म में युवाओं को एक मैसेज दिया गया है.खासकर टीन एजर्स में पढ़ाई से दूर होने आदि कई बिन्दुओं पर आधारित है मुक़द्दरपुर का मजनू फ़िल्म. पुरी तरह से कॉमेडी,इमोशन,ड्रामा और से भरी है.फ़िल्म की शूटिंग लखनऊ और मुम्बई में हुई है.उन्होंने बताया की फ़िल्म के निर्देशक रविकांत सिंह,राइटर शेखर रमेश है. फ़िल्म करीब सवा दो घंटे की है. अपने मंजिल को पाने के लिये कड़ी मेहनत और लग्न से हासिल किया जा सकता है. सिद्दत से किये गए कार्य बेकार नहीं जाते. मेरे मामा वसीम अंसारी, बड़े भाई साहबुद्दीन अंसारी ने मेरे इस क्षेत्र में कार्य करने में पूरा सहयोग किया. उसी के कारण मैं आज यहाँ तक पहुंचा हूं. अभिनेता साहिल अंसारी ने और कहा की मैं जिस समुदाय और जिस इलाके से वास्ता रखता हूं. यहां से थियेटर या फ़िल्म लाइन में जाने की मंजूरी अमूमन नहीं मिल पाता है. मैंने दसवी की पढ़ाई के दौरान शहर में दुर्गा पूजा आदि फेस्टिवल में नाटक/ड्रामा देखने जाता था. तभी से ही थियेटर/फ़िल्म में जाने का इरादा किया था.मेरे मम्मी पापा पढ़ाई लिखाई में स्पोर्ट बहुत करते थे, लेकिन थियेटर में जाने को लेकर कई सवाल होते रहे.

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