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जीवित्पुत्रिका व्रत 14 को, माताएं रखेंगी निर्जला व्रत

Updated at : 12 Sep 2025 10:43 PM (IST)
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जीवित्पुत्रिका व्रत 14 को, माताएं रखेंगी निर्जला व्रत

आज माताएं करेंगी नहाय-खाय, 15 की सुबह होगा जिउतिया व्रत का पारण

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आज माताएं करेंगी नहाय-खाय, 15 की सुबह होगा जिउतिया व्रत का पारण

खगड़िया. पुत्रवती माताओं के लिए जिउतिया 14 सितंबर को मनाया जायेगा. शनिवार को महिलाएं नहाय खाय करेगी. उसके अगले दिन 15 सितंबर को जिउतिया व्रत का पारण करेगी. जिसको लेकर महिलाएं तैयारी शुरू कर दी है. शुक्रवार को शहर में पूजन सामग्री खरीदारी के लिए महिलाओं की भीड़ लग रही. गोगरी के भोजुआ निवासी ज्योतिषाचार्य डॉ. शुभम सावर्ण ने बताया कि सनातन धर्मावलंबियों में इस व्रत का खास महत्व है. भविष्य पुराण, स्मृति ग्रंथ, निर्णय सिंधु और विष्णु धर्मोत्तर में प्रदोष व्यापिनी अष्टमी में जीमूतवाहन की पूजा का वर्णन है. बताया कि अष्टमी तिथि 14 सितंबर की सुबह 8:41 बजे से 15 सितंबर की सुबह 6:36 बजे तक रहेगी. इसीलिए 15 सितंबर को अष्टमी तिथि की समाप्ति के बाद व्रती महिलाएं पारण करेंगी. नहाय-खाय के दिन महिलाएं गंगा अथवा अन्य पवित्र नदी-तालाब में स्नान कर व्रत का संकल्प लेती हैं.

दही-चुड़ा खाकर महिलाएं लेगी संकल्प

महिलाएं अपने अखंड सौभाग्य, संतानों की मंगल कामना, दीर्घायु होने और वंश वृद्धि के लिए जीवत्पुत्रिका का निर्जला करती है. इस दिन कुश से राजा जीमूतवाहन की मूर्ति बनाकर उनकी पूजा के साथ माता लक्ष्मी और देवी दुर्गा की पूजा की जाती है, पूजा के बाद माताएं ब्राह्मणों से राजा जीमूतवाहन की कथा सुनकर उनको दक्षिणा प्रदान करती हैं. राजा जीमूतवाहन की कथा सबसे पहले भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी. जिउतिया व्रत में व्रति महिलाओं के द्वारा सैरगाही करने का भी रिवाज है. इसके लिए महिलाएं 13 सितंबर शनिवार की रात में 4 बजे सुबह यानी सूर्योदय से पहले सरगही करेंगी. व्रत करने वाली महिलाएं इस समय चाय, शरबत, ठेकुआ, पिड़िकिया, दही-चूडा आदि ग्रहण कर व्रत का संकल्प लेंगी.

मडुआ की रोटी और नोनी के साग का है महत्व

जिउतिया व्रत में नहाय-खाय के दिन व्रतियों के द्वारा मडुआ की रोटी, नोनी की साग और झिन्गली की सब्जी खाई जाती है. मान्यता है कि मडुआ और नोनी सांग उसर भूमि में भी उपजती है. इसी प्रकार उनकी संतान की सभी परस्तिथियों में रक्षा होगी. जिस प्रकार नोनी की साग दिनों-दिन विकास करती है, उसी प्रकार उनके वंश में भी वृद्धि होती है. इसीलिए नहाय-खाय के दिन इसके सेवन की परंपरा है. इसी प्रकार पारण के दिन घरों में चावल, कुशी केराव की झोर, पोरय की पत्ती की साग, कंदा अथवा ओल की सब्जी आदि पकाई जाती है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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