सत्य सर्वत्र होता है, सत्य की चाह सबको होती है, आचार्य गौरवकृष्ण

Updated at : 04 Jan 2026 7:01 PM (IST)
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सत्य सर्वत्र होता है, सत्य की चाह सबको होती है, आचार्य गौरवकृष्ण

सत्य सर्वत्र होता है, सत्य की चाह सबको होती है, आचार्य गौरवकृष्ण

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स्वर्ण जयंती समारोह के दूसरे दिन भी कथ्मा सनने को उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़ कटिहार श्री श्याम मित्र मंडल की ओर से आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के दूसरे दिन रविवार को भी श्रद्धालुओं ने ज्ञान रस की भक्ति मे सराबोर दिखे. राजेंद्र स्टेडियम में आयोजित कार्यक्रम में भक्ति, प्रेम और आनंद की दिव्य धारा प्रवाहित हो रही है. श्रीमद्भागवत कथा के पावन शब्द, हरिनाम की मधुर गूंज और श्रद्धालु की एकाग्र भक्ति अद्भुत है. यह केवल कथा नहीं, प्रभु से साक्षात मिलन का मधुर क्षण है. संस्था अपने स्वर्ण जयंती महोत्सव के अवसर पर श्रद्धालुओं से प्रार्थना किया है कि इस आलौकिक समय का साक्षी बने. जहां हर श्लोक आत्मा को स्पर्श करता है और हर क्षण कृष्णमय हो जाता है. दूसरे दिन रविवार को 10 बजे से 12 बजे दिन तक श्रीमद्भागवत गीता जी का पूरे विधि विधान के साथ पंडित जी द्वारा जजमानों को पूजा पाठ कराया गया. बड़ी संख्या में भक्तजनों ने बाबा श्याम जी के अखंड ज्योति की पूजा अर्चना की. रात्रि मे स्थानीय भजन कलाकारों द्वारा मधुर भजनों की प्रस्तुति हुई. आचार्य श्री गौरवकृष्ण गोस्वामी जी ने कहा कि कटिहार की नगरी में प्रेम की अग्नि में परवाना होना चाहते है. ये कटिहार वाले फिर से दीवाना होना चाहते है. श्रीमद्भागवत् सप्ताह कथा के द्वितीय दिवस की कथा का विस्तार से व्याख्यान देते हुए आचार्य गोस्वामी श्री मृदुल कृष्ण जी महाराज ने बताया कि श्रीमद्भागवत् कथा श्रवण करने मात्र से व्यक्ति की भगवान में तन्मयता हो जाती है. उन्होंने कहा कि धर्म जगत में जितने भी योग, यज्ञ, तप, अनुष्ठान आदि किये जाते है. उन सब का एक ही लक्ष्य होता है कि हमारी भक्ति भगवान में लगी रहे. मैं अहर्निश प्रतिक्षण प्रभु प्रेम में ही समाया रहूं. संसार के प्रत्येक कण में हमें मात्र अपने प्रभु का ही दर्शन हो. श्रीमद्भागवत् कथा श्रवण मात्र से भक्त के हृदय में ऐसी भावनाएं समाहित हो जाते हैं और मन, वाणी और कर्म से प्रभु में लीन हो जाता है. रस से भरा है भागवतरूपी फल श्री व्यास जी ने कहा कि श्रीमद्भागवत् के प्रारंभ में सत्य की वंदना की गयी है. क्योंकि सत्य व्यापक होता है. सत्य सर्वत्र होता है और सत्य की चाह सबको होती है. पिता अपने पुत्र से सत्य बोलने की अपेक्षा रखता है. भाई भाई से सत्य पर चलने की चेष्टा करता है. मित्र मित्र से सत्यता निभाने की कामना रखता है. यहां तक की चोरी करने वाले चोर भी आपस में सत्यता बरतने की अपेक्षा रखते है. इसलिए प्रारंभ में श्रीवेदव्यास जी ने सत्य की वंदना के द्वारा मंगलाचरण किया है और भागवत कथा का विश्राम ही सत्य की वंदना के द्वारा ही किया है. (सत्यं परं धीमहि) क्योंकि सत्य ही कृष्ण है. सत्य ही प्रभु श्रीराम है. सत्य ही शिव एवं सत्य ही मां दुर्गा है. इसलिए कथा श्रवण करने वाला सत्य को अपनाता है. सत्य में ही रम जाता है. यानी सत्य रूप परमात्मा में विशेष तन्यमता आ जाती है. माना जीवन का सर्वश्रेष्ठ परम धर्म यही है कि जीवन में अपने इष्ट के प्रति प्रगाढ भक्ति हो जाये. श्रीव्यास जी ने कहा कि श्रीमद्भागवत में निष्कपट धर्म का वर्णन किया गया है, जो व्यक्ति निष्कपट हो. निर्मत्सर हो. उसी व्यक्ति की कथा कहने एवं कथा श्रवण करने का अधिकार है. उन्होने बताया कि श्रीमद्भागवत् कथा श्रवण करने का संकल्प लेने मात्र से अनिरूद्ध के पितामह श्रीकृष्ण भक्त के हृदय में आकर के अवश्रद्ध हो जाते है. कथा कम में श्री आचार्य जी ने श्रीमद्भागवत् को वेदरूपी वृक्ष का पका हुआ फल बताया और अन्य फलों की अपेक्षा इस भागवतरूपी फल में गुठली एवं छीलका न होकर केवल रस में ही भरा है. इस कथा को जीवनपर्यन्त व्यक्ति को पान करना चाहिए.

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