गंगा- कोसी के तटीय क्षेत्रों में विदेशी पक्षियों का करलव बना आकर्षण का केंद्र

Updated at : 10 Dec 2025 6:33 PM (IST)
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गंगा- कोसी के तटीय क्षेत्रों में विदेशी पक्षियों का करलव बना आकर्षण का केंद्र

गंगा- कोसी के तटीय क्षेत्रों में विदेशी पक्षियों का करलव बना आकर्षण का केंद्र

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कुरसेला ठंड के बढ़ते असर के बीच प्रतिवर्ष की तरह इस साल गंगा, कोसी के जलग्रहण क्षेत्रों में विदेशी शैलानी पंक्षियों का आगमन हो चुका है. नदियों के छारण के बीच विचरण करते विविध प्रवासी पंक्षियों के झुंड का करलव आकर्षण का केन्द्र बन गया है. मेहमान परिंदे उस स्थान को बसेरा बनाते हैं, जहां आहार मिलने के साथ मानवीय गतिविधियां कम होती है. कुरसेला में कोसी, गंगा नदियों का बड़ा प्रवाह क्षेत्र है. जिसके बीच छारण के साथ कई झीलनुमा स्थान है. प्रत्येक वर्ष इन्हीं जगहों के एक बड़े भूभाग पर प्रवासी पंक्षी दूर देशों से आकर डेरा डालते है. यह मेहमान पंक्षी कूछ माह प्रवास के बाद वापस वतन को लौट जाया करते हैं. प्रत्येक वर्ष की भांति इस साल भी शरद ऋृतु पर गंगा कोसी के जलग्रहण क्षेत्र में मेहमान प्रवासी पंक्षियों का आगमन होना बताया जा रहा है. माना जाता है की गंगा नदी के प्रवाह क्षेत्र के बीच विदेशी शैलानी पंक्षी का विचरण और बसेरा होता है. विदेशी पंक्षियों के झुंड में लालसर, अधिंगा, चाहा, खंजन, फुदकी, चील, बाज सहित साइब्रेरियन क्रेन आदि शामिल होते है. यह पंक्षी रूस के साइबेरिया, चीन, कजाकिस्तान, तिब्बत सहित दूसरे देशों से समूह में प्रवास के लिए यहां आते हैं. विविध पंक्षियों का झुंड का समूह सुरक्षा के तौर पर एक स्थान पर डेरा जमाते हैं. पंक्षियों का उड़ान भी समूह में होता है. मानवीय गतिविधियों के भनक मिलते ही ये पंक्षी उंची उड़ान भर लेते है. स्वयं के सर्तकता के भरोसे प्रवास के माह को गुजारने का कार्य करते हैं. झीलनुमा नदियों के छारण क्षेत्र के आसपास प्रवासी पक्षियों को प्रचुर मात्रा में आहार मिल जाता है. भोजन के कम पड़ने प्रवासी पक्षी जगह बदल लिया करते हैं. शिकारियों से शिकार बनने का खतरा भारत की सांकृतिक परम्परा अतिथि देवो भवः की रही है. बावजूद विदेशी मेहमान पक्षी यहां आकर शिकारियों के हाथों शिकार होकर जीवन गंवा जाते हैं. पक्षियों के आगमन के बाद इन पक्षियों के शिकार के लिए कई शिकारी सक्रिय हो जाते हैं. बताया जाता है कि रात में जाल डाल कर और दूसरे तरीकों से इस मेहमान पक्षियों का शिकार किया जाता हैं. दिन के उजाले में इन पंक्षियों का शिकार करना कठिन होता है. शिकार के बाद इन पक्षियों को गुपचुप तरीकों से उंचे कीमतों पर बिक्री की जाती है. पंछियों में अधिक मांग लालसर, चाहा, अधिंगा पंक्षियों की होती है. बताया जाता है कि शिकार किये गये पंक्षियों का बाहर के व्यपारियों द्वारा खरीद कर बड़े शहरों तक पहुंचा कर मनमाने कीमतों पर बिक्री की जाती है. प्रवासी पंक्षियों के शिकार के लिए कुरसेला परिक्षेत्र में कई शिकारी सक्रिय बताये जाते है. जिसका मकसद इन पंक्षियों का शिकार कर मोटी कमाई करना होता है. प्रशासनिक स्तर पर पंक्षियों के शिकार पर सख्ती की बंदिशे नहीं होने से शिकारियों का शिकार करने का सिलसिला चलते रहता है. पंक्षी खाने के ललक रखने वाले भी विदेशी परिंदों को शिकार कर आहार बना जाते हैं. ऐसे में प्रवास पर आने वाले पंक्षियों के जीवन असुरक्षा का शामत बनी रहती है. प्रवासी पंक्षियों की आगमन में कमी अनुकूल वातावरण व आहार के कमी से प्रवासी पंक्षियों के आगमन की स्ंख्या में निरंतर कमी आ रही है. पंक्षियों का शिकार अधिक होने पर विदेशी शैलानी पंक्षी स्थान बदल कर प्रवास करने लगते हैं. जानकारों की माने तो पिछले कुछ सालो से कतिपय वजहों से विदेशी शैलानी पंक्षियों के आगमान में निरंतर कमी आ रही है. हालांकि जिले के कई ऐसे झील व स्थान है. जहां वेदेशी परिंदों का आगमान होता है. इन पंक्षियों की सुरक्षा खुद व ईश्वर के भरोसे होती है.

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