गुलजार होने की ओर है कुरसेला का मक्का मंडी

Updated at : 30 Apr 2024 11:59 PM (IST)
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गुलजार होने की ओर है कुरसेला का मक्का मंडी

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कुरसेला. फसल की तैयारी शुरु होते ही कुरसेला का मक्का मंडी गुलजार होने लगा है. थोक व खुदरा खरीदार व्यवसायियों के यहां मक्के की आवक बढ़ गयी है. मौसम के अनुकूल होने से किसान मक्का की तैयारी में जुटे हैं. मक्का खरीदारी के लिये कुरसेला बड़ा मंडी के रुप मे उभरा है. कुरसेला सहित आसपास क्षेत्रों में धर्मकांटा और भंडारण के लिये बड़े-बड़े गोदाम का निर्माण हो चुका है. तैयार मक्का का आवक बढ़ने से रैक प्वांइट की रौनक बढ़ गयी है. मंडी में मक्का लदे ट्रेक्टर-ट्रक की आवाजाही बढ़ने लगी है. वर्तमान दर से किसानो के खेती का लागत खर्च निकाल पाना कठिन बना हुआ है. फसल तैयारी के लिये मौसम अनुकूल होने से किसान आनन-फानन में मक्का तैयारी में जुटे हैं ताकि फसल को अच्छे मूल्यों पर मक्का की बिक्री का लाभ उठा सके. किसानो को यह आशंका घेरे रहती है कि मक्का के दर में गिरावट से उसे अधिक नुकसान उठाना पड़ सकता है. इस साल किसानों को मक्का फसलों का उचित लाभ मिलने की उम्मीद है. हालांकि मक्का के वर्तमान दरों से किसान खुश नहीं है. किसानों का कहना है कि मक्का का दर तीन हजार प्रति क्विटंल से अधिक होना चाहिये था. रासायनिक खाद-बीज जुताई सिंचाई के बढते खर्च से मक्का की खेती में लागत कई गुणा बढ़ गयी है. डीजल सहित खेती करने के संसाधन का खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है. उस हिसाब से मक्का के वर्तमान दर से खेती का लागत पूंजी का निकल पाना कठिन है. परिक्षेत्र के किसान मुख्य नगदी फसल के रुप मे सेकड़ों हेक्टयर क्षेत्र में खेती करते आये हैं. मक्का फसल पैदावार के लिये जिले के सीमावर्ती क्षेत्र का भूभाग अहम साबित होता आया है. उधर रैक प्वांइट पर मक्का खरीदारी और माल गाड़ियों मे मक्का लोडिंग के लिये आने वाले कुछ सप्ताह में चहल-पहल बढ़ने की उम्मीद है.

दरों पर अंकुश रखने की नही होती है व्यवस्था

जानकारी के अनुसार सरकारी स्तर पर मक्का मुल्य पर अंकुश बनाये रखने के लिये कोई व्यवस्था नही है.सरकार के घोषणा अनुरुप स्थानीय स्तर पर मक्का के खरीदारी मे अंतर बना रहता है. जिसका नुकसान कृषकों को मक्का बेच कर उठाना पड़ता है. खास कर छोटे और साधन विहीन किसानों को तैयार मक्का फसल को बेचने की मजबूरी होती है. खेती कर्ज और आर्थिक लचारी मे किसान बाजार के तय दरों में मक्का बिक्री कर जाते हैं. बदौलत किसान कर्ज के गिरफ्त से बाहर नहीं निकल पाते हैं.

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