फलका फलका बाजार में एक अनोखी मिसाल दृष्टिहीन मनोज शर्मा पेश कर रहे हैं. शारीरिक समस्याओं को दरकिनार कर वे पान की एक छोटी-सी दुकान चलाकर अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं. उनकी मेहनत और आत्मनिर्भरता क्षेत्र के लोगों के लिए प्रेरणास्रोत बनी हुई है. मनोज जन्म से ही दृष्टिहीन हैं. उन्होंने कभी इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया. पारिवारिक स्थिति कमजोर होने से जल्दी ही आत्मनिर्भर बनने की ठानी. सीमित संसाधनों के बावजूद, फलका बाजार में एक छोटी-सी पान की दुकान शुरू की. शुरू में उन्हें कई परेशानियों का सामना करना पड़ा. लेकिन धीरे-धीरे स्थानीय लोगों का समर्थन मिलने लगा. ग्राहकों के भरोसे व ईमानदारी से बना नाम मनोज अपनी दुकान पर पान, सुपारी, सिगरेट, गुटखा और कोल्ड ड्रिक्स बेचते हैं. वे ग्राहकों के पैसे और सामान को छूकर पहचान लेते हैं. उनकी ईमानदारी और मेहनत ने उन्हें बाजार में एक पहचान दिलायी है. ग्राहक भी उनकी लगन और आत्मनिर्भरता को देखकर उन्हें प्रोत्साहित करते हैं. उनकी दुकान से ही खरीदारी करना पसंद करते हैं. इंटर पास मनोज को पहले नौकरी की तलाश थी. नौकरी नहीं मिली तो वह आत्मर्भर बनने के लिए पान का दुकान खोल दिया. मनोज का कहना हैं उन्हें कोई भी सरकारी लाभ नहीं मिल रहा है. सरकार व समाज से सहयोग की अपेक्षा मनोज अपनी जीविका स्वयं चला रहे हैं. लेकिन उन्हें सरकार और समाज से थोड़ी मदद की जरूरत है. अगर उन्हें कोई सरकारी योजना का लाभ या किसी स्वयंसेवी संस्था से सहायता मिले, तो वे अपनी दुकान को और बेहतर बना सकते हैं. दृष्टिहीन मनोज आज समाज में आत्मनिर्भरता और संघर्ष का एक उदाहरण बन चुके हैं. उनकी कहानी यह संदेश देती है कि हौसला और मेहनत से किसी भी कठिनाई को पार किया जा सकता है. प्रेरणा के स्रोत बने मनोज मनोज की यह कहानी उन सभी के लिए प्रेरणा है जो कठिनाइयों के आगे हार मान लेते हैं. उनकी लगन और मेहनत यह साबित करती है कि अगर आत्मविश्वास और मेहनत हो, तो कोई भी व्यक्ति अपनी जिंदगी को सफल बना सकता है. स्थानीय लोगों का भी कहना है कि सरकार को उनकी मदद के लिए आगे आना चाहिए. ताकि वे और सशक्त बन सकें. मनोज के पिता शंकर शर्मा को अपने दृष्टिहीन पुत्र पर गर्व हैं. कहा, मनोज दृष्टिहीन होने के बावजूद भी पान दुकान चलाकर पूरा घर चला रहा है.
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