अमदाबाद में बाढ़ की आहट से पहले निजी नावों की मरम्मत तेज

गंगा नदी किनारे खड़ी नाव
Flood Season: कटिहार जिले के अमदाबाद प्रखंड में मॉनसून के दस्तक देने और नदियों के जलस्तर में संभावित बढ़ोतरी से पहले ही निचले इलाकों के ग्रामीणों ने सुरक्षात्मक कदम उठाने शुरू कर दिए हैं. बाढ़ के 4 महीनों के दौरान आवागमन का एकमात्र सहारा रहने वाली अपनी निजी नावों (Boats) को स्थानीय लोग खुद के खर्च पर युद्धस्तर पर दुरुस्त और मरम्मत करने में जुट गए हैं.
कटिहार के अमदाबाद से मनोज कुमार की रिपोर्ट
Flood Season: बिहार के सीमांचल और खास तौर पर महानंदा व गंगा नदी के जलस्तर में होने वाले उतार-चढ़ाव से हर साल तबाही झेलने वाले कटिहार जिले के अमदाबाद प्रखंड में प्रशासनिक दावों से इतर ग्रामीणों ने आत्मनिर्भर होकर बाढ़ की पूर्व तैयारियां शुरू कर दी हैं. अमदाबाद प्रखंड के अधिकांश हिस्से टापू और निचले दियारा क्षेत्र में बसे हैं, जहां जून के अंतिम सप्ताह से ही बाढ़ का पानी तेजी से फैलने लगता है. बाढ़ के दिनों में जब पूरा इलाका जलमग्न हो जाता है और मुख्य सड़कें पानी में समा जाती हैं, तब यहां के लोगों की जिंदगी पूरी तरह ‘नाव’ के भरोसे ही टिक जाती है. इसी कड़वी हकीकत को भांपते हुए पार दियारा, भवानीपुर खट्टी समेत आधा दर्जन गांवों के लोग अपनी पुरानी और जर्जर हो चुकी नावों की डेंटिंग-पेंटिंग, अलकतरा लगाने और लकड़ी बदलने के काम में दिन-रात जुटे हुए हैं.
30 जून के बाद शुरू हो जाता है जल प्रलय; नाव नहीं तो थम जाती है जिंदगी
- 30 जून की कड़ी डेडलाइन: स्थानीय ग्रामीणों के कड़े अनुभवों के अनुसार, हर साल 30 जून के बाद नदियों का बैकवाटर निचले मैदानी इलाकों और खेतों में घुसना शुरू हो जाता है. इसके बाद करीब तीन से चार महीने तक पूरा अमदाबाद प्रखंड बाढ़ का दंश झेलता है.
- सड़कों का अस्तित्व होता है खत्म: गांव को अनुमंडल और जिला मुख्यालय से जोड़ने वाली मुख्य पक्की व कच्ची सड़कें 5 से 8 फीट पानी में डूब जाती हैं, जिससे पैदल या बाइक से चलना पूरी तरह असंभव हो जाता.
- बाजार और राशन की लाइफलाइन: दैनिक मजदूरी करने, रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं (राशन, दवा) की खरीदारी करने और कटिहार जिला मुख्यालय के सरकारी या गैर-सरकारी कार्यालयों तक पहुंचने का एकमात्र जरिया केवल नाव ही बचती है.
माल-मवेशियों के चारे का संकट; इन गांवों के हर घर में है ‘निजी नाव’
दियारा इलाके की अनोखी परंपरा: बाढ़ के समय इंसानों से ज्यादा संकट बेजुबान पशुओं और माल-मवेशियों के चारे (कुट्टी-भूसा) का होता है. ऊंचे स्थानों पर शरण लिए मवेशियों के लिए चारा लाने के लिए ग्रामीण प्रतिदिन नावों के जरिए ही जलमग्न खेतों तक जाते हैं.
यही कारण है कि अमदाबाद प्रखंड के निम्नलिखित सर्वाधिक प्रभावित गांवों के लगभग हर दूसरे या तीसरे घर में एक ‘निजी नाव’ (Private Boat) अनिवार्य रूप से देखने को मिलती है:
- पार दियारा (पूर्णतः जलमग्न क्षेत्र)
- भवानीपुर खट्टी
- चौकिया पहाड़पुर
- दक्षिणी करिमुल्लापुर
“निजी नाव न हो तो बीच मझधार में फंस जाती है जान”; ग्रामीणों का दर्द
ग्रामीणों का कहना है कि बाढ़ के समय सरकारी या सामूहिक नावों की संख्या काफी कम होती है और उनके परिचालन का समय भी निश्चित होता है. यदि रात-बिरात किसी की तबीयत खराब हो जाए या कोई इमरजेंसी आ जाए, तो निजी नाव न होने पर लोग गांव में ही बंधक बनकर फंस जाते हैं. कई बार समय पर अस्पताल न पहुंच पाने के कारण अनहोनी भी हो जाती है.
इसलिए, किसी भी आपातकालीन स्थिति से बचने, काम से सुरक्षित घर लौटने या घर से बाहर निकलने के लिए ग्रामीण कर्ज लेकर या अपनी जमा पूंजी लगाकर अपनी नावों की वाटरप्रूफिंग (मरम्मत) समय से पहले पूरी कर रहे हैं, ताकि आने वाली आपदा के सामने वे बेबस न खड़े रहें.
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लेखक के बारे में
By दिव्यांशु प्रशांत
दिव्यांशु प्रशांत वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल में बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। उन्होंने महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में परास्नातक की शिक्षा प्राप्त की है। मीडिया क्षेत्र में लगभग एक वर्ष के अनुभव के दौरान वे दैनिक जागरण में न्यूज़ राइटर और रिपोर्टर के रूप में कार्य कर चुके हैं। करियर के शुरुआती दौर में लोकसभा और विधानसभा चुनावों से जुड़े पॉलिटिकल कंटेंट राइटिंग का विशेष अनुभव प्राप्त किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने टी. एन. बी. कॉलेज से हिंदी साहित्य में स्नातक किया है, जिसके कारण साहित्य, पठन-पाठन, लेखन और कविता-सृजन में उनकी विशेष रुचि है। सटीक, निष्पक्ष और प्रभावशाली लेखन के माध्यम से पाठकों तक विश्वसनीय जानकारी पहुँचाना उनकी पेशेवर पहचान है।
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