कम लागत में अच्छी पैदावार

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सलाह . लत्तीदार व अौषधीय पौधों की खेती की बढ़ेगी आमदनी बाढ़ के बाद जमने वाली मिट्टी फसलों के लिए वरदान साबित होगी कटिहार : भले ही बाढ़ के प्रकोप से पूरा जिला त्राहिमाम कर रहा हो, लेकिन बाढ़ के बाद जमने वाली मिट्टी फसलों के लिए वरदान साबित होगी. किसानों को परंपरागत खेती के […]

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सलाह . लत्तीदार व अौषधीय पौधों की खेती की बढ़ेगी आमदनी

बाढ़ के बाद जमने वाली मिट्टी फसलों के लिए वरदान साबित होगी
कटिहार : भले ही बाढ़ के प्रकोप से पूरा जिला त्राहिमाम कर रहा हो, लेकिन बाढ़ के बाद जमने वाली मिट्टी फसलों के लिए वरदान साबित होगी. किसानों को परंपरागत खेती के अलावे अन्य विकल्पों पर भी ध्यान देना होगा, तब जाकर उन्हें कम लागत में अच्छी पैदावार मिल सकेगी. इस संदर्भ में कृषि विज्ञानी डॉ अजय कुमार दास कहते हैं कि बाढ़ के बाद जब पानी कम हो जाता है तो खेतों में गाद भर जाता है. जिसमें बालू की मात्रा अधिक होती है.
ऐसे में यह मिट्टी धान, गेहूं व मक्के की खेती के लिए अनुपयुक्त साबित होती है. कृषि विज्ञानी का मानना है कि ऐसी मिट्टी में इन फसलों की खेती करने के बजाये लत्तर वर्गीय सब्जी मसलन करेला, परवल, खीरा, कद्दू, मूंग, ढैंचा, दलहन समेत औषधीय पौधे जैसे खस, मैंथा, सेंट्रोनेला, पुदिना की खेती की जा सकती है. इन फसलों के लिए सरकार किसानों को अनुदान भी देती है. इस तरह की खेती करने से किसानों को कम लागत में अधिक मुनाफा होता है.
हरी खाद के तौर पर होती है मूंग की खेती : बाढ़ के बाद जब खेतों में बालू और गाद की मात्रा अधिक हो जाती है तब इन खेतों में मूंग समेत अन्य दलहन की खेती करने का जबरदस्त फायदा किसानों को मिलता है. आमतौर पर मूंग को हरी खाद की संज्ञा दी गयी है. मूंग व ढैंचे की खेती करने से खेतों में नाइट्रोजन की मात्रा प्राकृतिक तौर पर बढ़ने लगती है. जिससे किसानों को अलग से खेतों में कंपोस्ट डालने की जरूरत नहीं पड़ती है. इस खेती को लगातार दो तीन सीजन तक दोहराने से खेतों की उर्वरा शक्ति प्राकृतिक तौर पर बढ़ जाती है.
पहले भी किया जा चुका है प्रयोग
सूबे के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में परंपरागत फसलों के अलावे अन्य फसलों की जानकारी समय समय सरकार द्वारा किसानों की दी जाती है. किसानों को होने वाले नुकसान को पाटने के लिए सरकार इन खेती को बढ़ावा देती है ताकि किसानों को हुए नुकसान की भरपाई की जा सके. इस संबंध में कृषि विज्ञानी कहते हैं कि ऐसी खेती का प्रयोग पहले कुसहा त्रासदी के वक्त सुपौल, सहरसा व मधेपुरा जिला में किया जा चुका है.
वर्ष 2008 में आये कुसहा त्रासदी के बाद जब खेतों में बालू जम गये थे तो विभाग द्वारा किसानों को औषधीय व लत्तीदार पौधों की फसलें उगाने की नसीहत दी गयी थी ताकि उन्हें कम लागत में अच्छी पैदावार मिल सके. इन जिलों के किसानों ने नये प्रयोग का इस्तेमाल किया जिसका उन्हें फायदा भी मिला. बता दें कि बाढ़ के बाद खेतों में जमने वाले गाद में इन फसलों की अच्छी खासी पैदावार होती है. हालांकि कुछेक वर्ष बाद इन खेतों में नये सिरे से धान, गेहूं व मक्के की अच्छी पैदावार की जा सकती है.
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